समय रूपी अमूल्य उपहार का एक क्षण भी आलस्य और प्रमाद में नष्ट न करें।


By Pandit Shriram Sharma Acharya
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नारी का गौरव चौके- चूल्हे तक सीमित रहने में नहीं है।


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श्रेष्ठता और संस्कृति का पहला गुण स्वच्छता है।

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मन ही अपना मित्र और मन ही अपना शत्रु है।


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स्वर्ग और नरक मनुष्य के ज्ञान और अज्ञान का ही परिणाम है।


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हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।


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जीवात्मा का परमात्मा से जुड़ जाने का नाम योग है।


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देवत्व की रक्षा करने से बढ़कर और कोई धर्म नहीं और देवत्व अपनाने से बढ़कर और कोई कर्तव्य नहीं।


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Generosity, empathy, and tenderness are the guidelines of serving others.


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अपने कार्यों में व्यवस्था, नियमितता, सुन्दरता, मनोयोग तथा जिम्मेदारी का ध्यान रखें।

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भगवान् के काम में लग जाने वाला कभी घाटे में नहीं रह सकता।


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जिसने शिष्टता और नम्रता नहीं सीखी, उनका बहुत सीखना भी व्यर्थ रहा।


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