समय रूपी अमूल्य उपहार का एक क्षण भी आलस्य और प्रमाद में नष्ट न करें।


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यह संसार एक विद्यालय है, जिसमें प्रवेश लेकर हर प्राणी अपनी प्रतिभा का परिपूर्ण विकास कर सकता है।


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अंतःकरण की सुन्दरता साधना से बढ़ती है।


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परोपकार से बढ़कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं।


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विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है।


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कर्तव्य मार्ग पर चलने में आने वाले कष्टों को स्वेच्छा और शान्ति से सहन करना ही सच्ची तपस्या है।


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दुर्भाग्य छोटे हृदय को दमन कर अपने वश में कर लेता है, परन्तु विशाल हृदय उस पर विजय पाकर खुद उसे दबा देते हैं।


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वही काम करना ठीक है, जिसे करके पछताना न पड़े।


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अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या से ही भुनाया जा सकता है।


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गुण, कर्म और स्वभाव का परिष्कार ही अपनी सच्ची सेवा है।


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शुद्ध और निश्छल हृदय से तन्मयता की अवस्था में ही ईश्वरीय वाणी सुनी जा सकती है।


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विपरीत परिस्थितियों में भी हँसी- खुशी का जीवन बिताने का अभ्यास व्रत कहलाता है।


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