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    दाम्पत्य जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, योग है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सबके सुख में ही हमारा सुख सन्निहित है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वासना, तृष्णा, क्षुद्रता और मोह निद्रा की अपेक्षा करते हुए कर्तव्यपालन और परमार्थ की आकांक्षाएँ जाग्रत करना ही जागरण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इस संसार में कमजोर रहना सबसे बड़ा अपराध है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    संस्कारवान् माताएँ ही उन्नत समाज का निर्माण करती हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार संस्था ही नर -  रत्नों की खदान बन सकती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    लज्जा और विनय ही नारी का आभूषण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी घर के देवालय में अवस्थित एक प्रत्यक्ष देवी है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों के साथ वैसी ही उदारता बरतो, जैसे ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    यदि तारे आकाश की सुषमा- शोभा है, तो नारी इस धरित्री की।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गृहस्थ एक तपोवन है जिसमें संयम, संयम, सेवा, त्याग और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार में मतभेद होने पर भी अथवा परिहास में भी अशिष्टता को स्थान न दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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