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    गृहस्थाश्रम समाज को सुनागरिक देने की खान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    श्रेष्ठता और संस्कृति का पहला गुण स्वच्छता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परमानन्द का अनुभव करने के लिए क्षेत्रीय भाव लाने की भी आवश्यकता है अर्थात देश के हेतु प्राण न्यौछावर करने के लिए प्रतिक्षण तत्पर रहा जाए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिस देश के लोग अपने कार्यों में ईमानदारी का प्रयोग करना छोड़ देते है, वह देश सब प्रकार दीन- हीन और नष्ट- भ्रष्ट हो जाता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धिक्कार है उस राष्ट्र को, जिसका हर सूबा अपने को एक राष्ट्र समझता है। धिक्कार है उस सूबे को जिसका हर कबीला अपने को एक सूबा समझता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आभूषणों के अलंकार से कहीं श्रेष्ठ है गुणों का अलंकार।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    राष्ट्रों की सम्पत्ति तो सद् गुणी मनुष्य ही है- रेशम, कपास या स्वर्ण नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पत्नी को दासी नहीं, साथी मानिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गुण, कर्म एवं स्वभाव के परिष्कार की प्रयोगशाला है- परिवार।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    किसी देश में उस समय तक एकता और प्रेम नहीं हो सकता, जब तक लोग एक- दूसरे के दोषों पर जोर देते रहेंगे।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शान्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए और युद्ध करके भी उसे प्राप्त करना चाहिए और कभी- कभी बलप्रयोग से भी उसे स्थापित करना चाहिए। यह बात एक घर और एक राष्ट्र दोनों ही के लिए लागू है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना सुख- वैभव दूसरों को बाँटना और दूसरों के प्रति ममता की वृद्धि ही धार्मिकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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