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  • भारतीय संस्कृति से संबंधित विचार


    कन्यादान और नारी- रक्षा से बढ़कर कोई पुण्य नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आभूषणों के अलंकार से कहीं श्रेष्ठ है गुणों का अलंकार।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने हृदय में अपने कार्य की पवित्रता पर पूर्ण विश्वास रखने वाले तथा दरिद्र और विपत्तिग्रस्त भाइयों को मुक्त करने के लिए अपने प्राणों तक का उत्सर्ग कर डालने का साहस रखने वाले वीर पुरुषों की ही आज भारतवर्ष को आवश्यकता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    राष्ट्रों की सम्पत्ति तो सद् गुणी मनुष्य ही है- रेशम, कपास या स्वर्ण नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिस देश को राजनीतिक उन्नति करनी हो, वह यदि पहले सामाजिक उन्नति नहीं कर लेगा, तो राजनीतिक उन्नति आकाश में महल बनाने जैसी होगी।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गुण, कर्म एवं स्वभाव के परिष्कार की प्रयोगशाला है- परिवार।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परमानन्द का अनुभव करने के लिए क्षेत्रीय भाव लाने की भी आवश्यकता है अर्थात देश के हेतु प्राण न्यौछावर करने के लिए प्रतिक्षण तत्पर रहा जाए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शान्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए और युद्ध करके भी उसे प्राप्त करना चाहिए और कभी- कभी बलप्रयोग से भी उसे स्थापित करना चाहिए। यह बात एक घर और एक राष्ट्र दोनों ही के लिए लागू है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दाम्पत्य जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, योग है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिस देश के लोग अपने कार्यों में ईमानदारी का प्रयोग करना छोड़ देते है, वह देश सब प्रकार दीन- हीन और नष्ट- भ्रष्ट हो जाता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गृहस्थाश्रम समाज को सुनागरिक देने की खान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी ही संस्कृति की संरक्षिका है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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