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    जिनकी तुम प्रशंसा करते हो, उनके गुणों को अपनाओ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो अपने लिए नहीं औरों के लिए जीते हैं वे जीवनमुक्त हैं ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपनी आत्मा को सबमें- सबकी आत्मा को अपने में समाया देखना ही अध्यात्म है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिसके भीतर जितने परिमाण में ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़पन है, वह उतना ही दिव्य आत्मा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना अंतःकरण इतना निर्मल और पवित्र बनाओ कि उसमें ईश्वर का प्रकाश स्वयमेव झिलमिलाने लगे।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने कुछ होने का अहंकार ही व्यक्ति को उसके गौरव से वंचित करता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    बुद्धि वैभव चमत्कारी तो है पर हृदय की विशालता से बढ़कर उसकी गरिमा है नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    साहस एवं विधेयात्मक दृष्टिकोण अध्यात्म का पहला पाठ है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इन्द्रियाँ किसी को नहीं सताती, वे तो उपयोगी प्रयोजनों के लिये बने हुये साधन मात्र हैं। उच्छृंखल तो मन है। उसी को समेटो ताकि इन्द्रियों द्वारा अपनी उच्छृंखलता के लिए बाधित न करें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जाग्रत् आत्मा का लक्षण है- सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् की ओर उन्मुखता

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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