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    शारीरिक गुलामी से बौद्धिक गुलामी भयंकर है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वही जीवित है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शरीर को देखकर मनुष्य होना पहचाना जाता है और भावना देख कर उसका दैत्य या देवता होना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भावपूर्ण प्रार्थना निरर्थक नहीं होती।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो सचमुच प्रेम करता है उसका हृदय धरती पर साक्षात स्वर्ग है। ईश्वर उसमें बसता है क्योंकि ईश्वर प्रेम है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आदर्शों के साथ लिपटी हुई आत्मीयता ही भक्ति भावना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भक्ति अन्तः से उफन कर आने वाली परहित के लिए त्याग- समर्पण की भावना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है- ‘सपनेहु आन पुरुष जग नाही।’ आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रो! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवन भर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक रूपवान, सौंदर्यवान, दयालु और संपत्तिवान और कोई हो नहीं सकता। हमारा वही सब कुछ है, वही हमारा भगवान् है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर विश्वास का फलितार्थ है- आत्मविश्वास और सदाशयता के सत्परिणामों पर भरोसा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सच्चा सुख- संतोष तब मिलता है, जब मनुष्य अपने आपको परमात्मा का एक उपकरण मानकर विशुद्ध त्याग भावना से परोपकार करता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर को ऐश्वर्य संपदा और वैभव नहीं, प्रेम तथा भक्ति ही प्रभावित करते हैं। कर्मों एवं भावनाओं के अनुरूप ही व्यक्ति की पात्रता उनके अनुग्रह को पाने योग्य विकसित होती है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भावना की उत्कृष्टता को ही प्यार करता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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