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  • भाव संवेदना से संबंधित विचार


    प्रेम में मनुष्य सब कुछ दे कर भी यही सोचता है कि अभी कम दिया।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हमारी उपासना एक है- समर्पण की, श्रद्धा की। हमने नाले की तरह से अपने आपको नदी के साथ में मिला दिया है और उसमें मिल जाने की वजह से हमारी हैसियत, हमारी औकात, हमारी शक्ति और हमारा स्वरूप नदी जैसा बन गया है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भावपूर्ण प्रार्थना निरर्थक नहीं होती।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नाव स्वयं ही नदी पार नहीं करती। पीठ पर अनेकों को भी लाद कर उतारती है। सन्त अपनी सेवा भावना का उपयोग इसी प्रकार किया करते है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भावना के भूखे हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जब तुम्हारा मन टूटने लगे, तब भी यह आशा रखो कि प्रकाश की कोई किरण कहीं न कहीं से उदय होगी और तुम डूबने न पाओगे, पार लगोगे।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मीठा बोलने वाला शत्रु को भी मित्र बना लेता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परमात्मा का श्रेष्ठ पुत्र कहलाने का सौभाग्य तब मिलता है, जब निष्काम भावना से सृष्टि के अन्य प्राणियों के साथ समता, न्याय और कर्तव्यपालन की उदारता बनी रहे।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो सचमुच प्रेम करता है उसका हृदय धरती पर साक्षात स्वर्ग है। ईश्वर उसमें बसता है क्योंकि ईश्वर प्रेम है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वही जीवित है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर विश्वास का फलितार्थ है- आत्मविश्वास और सदाशयता के सत्परिणामों पर भरोसा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है- ‘सपनेहु आन पुरुष जग नाही।’ आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रो! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवन भर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक रूपवान, सौंदर्यवान, दयालु और संपत्तिवान और कोई हो नहीं सकता। हमारा वही सब कुछ है, वही हमारा भगवान् है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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