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    परिवार की सेवा करना संसार की सेवा करना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी त्याग और उत्सर्ग की प्रतिमूर्ति है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    प्रत्येक सद्गृहस्थ का कर्तव्य है कि माता, भगिनी, पत्नी और कन्या के जिस रूप रहे, उसे स्वस्थ, प्रसन्न, शिक्षित, स्वावलम्बी एवं सुसंस्कृत, प्रतिभावान बनाने में कुछ भी कमी न रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाना समाज के उत्थान करने की एक छोटी प्रक्रिया है, उसको क्रियात्मक रूप देने की प्रयोगशाला परिवार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    एक स्त्री अपने जीवन में जितना त्याग करती है, पुरुष उतना त्याग सौ जन्मों में भी नहीं कर सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शील ही नारी की शोभा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    बनो न फैशन के दीवाने, करो आचरण मत मनमाने।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मन की निर्मलता और स्वभाव की पवित्रता ही नारी का सच्चा श्रृंगार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कदम क्रान्ति के नहीं रुकेंगे, बेटा- बेटी नहीं बिकेंगे


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी के हाथ में संसार की समस्त निराशा और कटुता मिटाने की क्षमता विद्यमान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी की अवमानना का अर्थ है- अपनी उद्गम शक्ति की गरिमा को गिराना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जब तक नारी वस्त्रों में बनाव- श्रृंगार में, फैशन में जेवर- आभूषणों में अपना व्यक्तित्व देखती रहेंगी, पुरुषों के लिए कामिनी बनकर उसकी वासनाओं की तृप्ति के लिए ही अपना जीवन समझती रहेगी या खा- पीकर घर की चहारदीवारी में पड़े रहना ही अपना आदर्श समझेगी, तब तक कोई भी शक्ति, नियम, कानून उसका उद्धार नहीं कर सकेगें। अपने उद्धार के लिए नारी को स्वयं भी जागरूक होना पड़ेगा। मातृत्व के महान् पद की प्रतिष्ठा को पुनः जीवित रखने के लिए उसे सीता, गौरी, मदालसा, देवी दुर्गा, काली की सी शक्ति, क्षमता और कर्तव्य का उत्तरदायित्व ग्रहण करना होगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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