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  • वेदो से दिव्य प्रेरणाये से संबंधित विचार


    नाऽकृत्वा सुखमेधते!
    अर्थात्- बिना कर्तव्य किये मनुष्य सुख नहीं प्राप्त करता |


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्मणि त्यज्यते प्रज्ञा।
    अर्थात्- कर्म में ही मनुष्यों की प्रज्ञा की अभिव्यक्ति होती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चिनुध्वं भो बुधाः पुण्यं यत्पुण्यं सुखसंपदाम्!
    अर्थात्- समस्त सुख- सम्पदाओं के कारणभूत पुण्य का संचय करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईशानः बधं यवय
    अर्थात्- मनुष्य अपनी परिस्थितियों का निर्माता आप है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपैतु सर्व मत् पापम्
    अर्थात्- सब प्रकार के दुष्कर्मों से बचो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    न तं कम्मं कतं साधु, यं कत्वा अनुतप्पति
    अर्थात्- वह काम करना ठीक नहीं, जिसे करके पीछे पछताना पड़े |


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपतस्य हतं तमो व्यावृतःपाप्मना
    अर्थात्- जिसका अज्ञान दूर होगा वही पाप से छुटेगा


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    विश्वाहा वयं सुमनस्यमाताः!
    अर्थात्- हम सदा ही अपने को प्रसन्न रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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