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  • समय रूपी अमूल्य उपहार का एक क्षण भी आलस्य और प्रमाद में नष्ट न करें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इस संसार का सबसे बडा़ पुण्य कार्य है - सद्विचारों की प्रेरणा करना और सत्कर्मों के लिए प्रोत्साहन देना ।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गायत्री को इष्ट मानने का अर्थ है- सत्प्रवृत्ति की सर्वोत्कृष्टता पर आस्था।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सुप्रसिद्ध अमरीकी लेखिका- हेलन केलर- "मुझे ईश्वर में विश्वास है, मुझे मनुष्य में विश्वास है, मुझे आत्मा की शक्ति में विश्वास है। मैं अपना पवित्र कर्तव्य समझती हूँ कि अपने साथ- साथ दूसरों के मन में उत्साह भरूँ और ईश्वर की इस सृष्टि के विरुद्ध कोई शब्द मुँह से निकलने न दूँ; क्योंकि जिस संसार को ईश्वर ने अच्छा बनाया है और जिसे हजारों- लाखों लोगों ने अच्छा बनाये रखने के लिए निरन्तर संघर्ष किया है, उससे शिकायत करने का किसी को अधिकार नहीं।‘‘


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सफलता की एक अनिवार्य शर्त है- ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परमात्मा का श्रेष्ठ पुत्र कहलाने का सौभाग्य तब मिलता है, जब निष्काम भावना से सृष्टि के अन्य प्राणियों के साथ समता, न्याय और कर्तव्यपालन की उदारता बनी रहे।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पुरुषों के पास यदि क्षात्रतेज है, तो नारी के पास ब्रह्मतेज


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अगर तुमने खुद पर शासन करना सीख लिया, तो तुम सारी दुनिया पर शासन करने का दावा कर सकते हो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरे की त्रुटियों और बुराइयों को ही न ढूँढ़ते रहो, अपनी ओर भी देखो, जो अपनी बुराइयों सुधारने के लिये प्रयत्नशील है, उसे ही दूसरों की बुराई ढूँढ़ने का अधिकार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भावना को पहचानते हैं और उसी के आधार पर भक्त की आराधना का मूल्यांकन करते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरे तुम्हें क्या कहते हैं, इस पर ध्यान मत दो। तुम अपनी दृष्टि में अच्छे बनो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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