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  • अपनी रोटी- मिल खाओ ताकि तुम्हारे सभी भाई सुखी रह सकें ।।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    श्रेष्ठता प्राप्त करने का अभ्यास आवेश या अंधानुकरण पर आधारित न हो, अन्यथा अधिक देर तक उसमें टिके रहना संभव नहीं होता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म से आशय है- अभ्युदय और निःश्रेयस् अर्थात उन गति- विधियों को अपनाया जाना, जो कल्याण एवं प्रगति का शालीनतायुक्त पथ प्रशस्त कर सकने की क्षमता रखती हों।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य और कुछ नहीं, मात्र भटका हुआ देवता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सज्जनों की कोई भी साधना कठिनाइयों में से होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सद्भावनाओं से खाली हृदय श्मशान की तरह सूना और भयंकर बना रहता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य उपाधियों से नहीं, श्रेष्ठ कार्यों से सज्जन बनता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इज्जत व मर्यादा के लिए लज्जा ही नारी का सबसे बड़ा पर्दा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    बहादुरी का अर्थ है हिम्मत भरी साहसिकता, निर्भीक पुरुषार्थ परायणता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    युग परिवर्तन के लिए नेतृत्व का परिवर्तन भी आवश्यक है। घर का नेतृत्व परख लिया गया। उसे असफल ही घोषित किया जायेगा;  क्योंकि हर क्षेत्र में आज जो अव्यवस्था फैली हुई है, उसमें उसका नेतृत्व ही उत्तरदायी है। प्रजातंत्रीय शासन की व्यवस्था यह है कि जिस विकास में कोई बड़ी अव्यवस्था दिखाई दे, उसके मंत्री को इस्तीफा देकर अलग होना पड़ता है और उस विग्रह का दोष अपनी कमी के रूप में स्वीकार करना पड़ता है। आज की व्यापक अव्यवस्था के लिए नर का नेतृत्व जिम्मेदार है। उसे पीछे हटना चाहिए और नारी को सहृदयता और स्नेहसिक्तता के आधार पर नये सिरे से नीति निर्धारण करने और व्यवस्था विधान बनाने का अवसर देना चाहिए। विश्व शक्ति की दृष्टि से यह परिवर्तन नितान्त आवश्यक है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हर मनुष्य का भाग्य उसकी मुट्ठी में है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    संसार का सबसे बड़ा दिवालिया वह है, जिसने उत्साह खो दिया।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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