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  • स्त्री के प्रति आसक्ति नहीं, उसकी दिव्यता के प्रति सम्मान का भाव रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिसनें जीवन में स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया सचमुच वह सबसे बड़ा कलाकार है ।।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो अपने लिए नहीं औरों के लिए जीते हैं वे जीवनमुक्त हैं ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने को समझे। मल- मूत्र की गठरी को अपना आधार न माने। ईश्वर का अंश पंचतत्त्वों की गठरी में इस लिये बंधा है कि इस उपकरण के सहारे वह अपने अभीष्ट प्रयोजनों को पूरा कर सके। लुहार हथौड़ा नहीं हो सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म अर्थात् कर्तव्य, फर्ज, ड्यूटी, जिम्मेदारी और ईमानदारी का समुच्चय।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    युग निर्माण योजना का आरम्भ दूसरों को उपदेश देने से नहीं, वरन् अपने मन को समझाने से शुरू होगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अनाचार बढ़ता है कब, सदाचार चुप रहता जब।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    लोहे की काई लोहे को खा जाती है इसी प्रकार पाप की वासनाएँ मनुष्य को खा जाती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिसके पास कुछ भी कर्ज नहीं, वह बड़ा मालदार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नित्य गायत्री जप, उदित होते स्वर्णिम सविता का ध्यान, नित्य यज्ञ, अखण्ड दीप का सान्निध्य, दिव्यनाद की अवधारणा, आत्मदेव की साधना की दिव्य संगम स्थली है- शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    राष्ट्र को बुराइयों से बचाये रखने का उत्तरदायित्व पुरोहितों का है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    स्वर्ग के दो पक्ष हैं- उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तव्य। जिसके अंतःकरण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई, तो समझना चाहिए कि उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही देवयोनि प्राप्त कर ली।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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