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  • दूसरों के लिए पाप की बात सोचने में पहले स्वयं को ही पाप का भागी बनना पड़ता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गुण ही नारी का सच्चा आभूषण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने आपको सुधार लेने पर संसार की हर बुराई सुधर सकती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अन्धकार में भटकते मनुष्यों को ज्ञान की दिव्य दृष्टि देना अन्धों को आँखें देने के समान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पुरुष से पुरुषोत्तम, नर से नारायण बनने का अभ्यास ही उपासना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिस भी साधना में दुष्प्रवृत्ति तपाई, जलाई जा रही हो ऐसा कोई कृत्य तप है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    क्रोध दिलाने पर भी चुप रहना बड़ी भारी बुद्धिमानी है, उससे बढ़कर बुद्धिमानी मन की चंचलता को रोकने में है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सांसारिक वासना को तुम भयानक रोग की तरह समझो, संयम को औषधि की तरह समझो। वासनारहित जीवन ही स्वस्थ जीवन है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दुर्गुणी का कभी कोई सच्चा मित्र नहीं हो सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सर्वांगीण उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना अलग बात है और तृष्णा की कल्पनाओं में लार टपकाते रहना अलग बात है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा से वरिष्ठ केवल एक ही शक्ति है- परमात्मा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वाक्शक्ति का दुरुपयोग न करें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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