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  • जीवन एक पाठशाला है, जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा प्राप्त करते हैं।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    युग परिवर्तन का पहला कार्य है- अपना परिवर्तन।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    रहे जहाँ नारी सम्मान, बनता है वह देश महान्।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा ही आत्मा का सहायक है। दूसरा और भला कौन सहायक हो सकता है? आत्म- संयम से मनुष्य दुर्लभ सहायता को प्राप्त कर लेता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ब्रह्मचर्य ही जीवन है, तेज है, शक्ति है और सामर्थ्य है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    प्राणिमात्र के हित की दृष्टि से उदारता, सेवा, सहानुभूति, मधुरता का व्यवहार करना ही परमार्थ का सार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन एक कर्तव्य है, जिसे पूरी तरह निभाया जाए।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर भक्ति का अर्थ है - आदर्शों के प्रति असीम प्यार। असीम का तात्पर्य है- इतना प्रबल कि उसे क्रियान्वित किये बिना रहा ही न जा सके।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    स्वास्थ्य संयम पर निर्भर है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना सुधार करो तो सम्पर्क में आने वाले दूसरे भी सुधर जाएँगें, जो अपने को नहीं सुधार सका उसका दूसरों के प्रति धर्मोपदेशक का अधिकार नहीं बनता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हर नारी देवी कहलाए, अबला क्यों ?? सबला कहलाए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म का महान् महत्त्व केवल दो शब्दों में निहित हैं, वे हैं- दया और प्रेम।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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