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  • सत्कर्म ही मनुष्य का कर्तव्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    स्वयं उत्कृष्ट बनने और दूसरों को उत्कृष्ट बनाने का कार्य आत्म कल्याण का एकमात्र उपाय है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    संसार में विद्या से बढ़कर कोई मित्र नहीं और अविद्या से बढ़कर कोई शत्रु नहीं ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    झूठ बोलना एक छोटी किन्तु बहुत बुरी आदत है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    समय का एक क्षण भी निरर्थक न जाने दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपनी आत्मा को सबमें- सबकी आत्मा को अपने में समाया देखना ही अध्यात्म है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मन का नियन्त्रण मनुष्य का एक आवश्यक कर्तव्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने कार्यों में व्यवस्था, नियमितता, सुन्दरता, मनोयोग तथा जिम्मेदारी का ध्यान रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चरित्र हमारे अन्तर का दीपक है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आज संपूर्ण नारी जाति से प्रार्थना है कि वह घिनौने वातावरण को छोड़कर परवशता की ग्रंथियाँ काटकर आगे बढ़े और समाज सुधार का, नैतिक उत्थान का, धार्मिक पुनर्जागरण का संदेश मानवता को दे। पुरुषों से कंधा मिलाकर घर और बाहर दोनों क्षेत्रों में नारी को कार्य करना होगा। आज भारत की माँग है- अध्यात्म एवं वैदिक धर्म का पुनरुत्थान और भारतीय धर्म एवं संस्कृति का पुनर्स्थापन। जब घर- घर में पुनः वेदों की वाणी गूँज उठेगी, तब भारत फिर से अपने प्राचीन जगद्गुरु के गौरव को प्राप्त करेगा। हर क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक, नैतिक, शैक्षणिक एवं नैष्ठिक पुनर्गठन करते हुए आज की शिक्षित नारी जिस पथ का निर्माण करेगी, वह पथ बड़ा सुगम एवं आध्यात्मिक होगा। नारी की सबल प्रेरणा पुरुष को नव शक्ति से भर देगी;   किन्तु इसके लिए आवश्यक है कि उसे आत्मबल, चरित्रबल, तपबल में महान् बनना होगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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