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    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी पुरुष की पूरकसत्ता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाना समाज के उत्थान करने की एक छोटी प्रक्रिया है, उसको क्रियात्मक रूप देने की प्रयोगशाला परिवार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमें संयम, सेवा, त्याग और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मात्र हवन, धूपबत्ती और जप की संख्या के नाम पर प्रसन्न होकर आदमी की मनोकामना पूरी कर दिया करें, ऐसे देवी- देवता दुनिया में कहीं नहीं है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    बच्चे का भावी भाग्य बनाना सदा माता का कार्य होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    किसी सदुद्देश्य के लिए जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् सज्जनों के लिए दीनबन्धु और दुष्टों के कालरूप हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परमात्मा को प्राप्त करने और प्रसन्न करने का मार्ग उसके नियमों पर चलना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अन्तःकरण को अशुद्ध वासनाओं से बचाए रखिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    निर्धनता मनुष्य के लिए बेइज्जती का कारण नहीं हो सकती। यदि उसके पास वह सम्पत्ति मौजूद हो, जिसे 'सदाचार्' कहते है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शिक्षा को ही दहेज मानकर लड़कियों को अवश्य शिक्षित बनाएँ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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