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  • आध्यात्मिक दृष्टि से हमारे देश को तभी वस्तुतः प्राधान्य मिलेगा, जब उसमें सुवर्ण की अपेक्षा सत्य की, ऐश्वर्य की अपेक्षा निर्भयता की, देहशक्ति की अपेक्षा परोपकार की समृद्धि दिख पड़ेगी।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अभिमान एक नशा है, जो मनुष्य को अन्धा बना देता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चिनुध्वं भो बुधाः पुण्यं यत्पुण्यं सुखसंपदाम्!
    अर्थात्- समस्त सुख- सम्पदाओं के कारणभूत पुण्य का संचय करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य जन्म सरल है, पर मनुष्यता कठिन प्रयत्न करके कमानी पड़ती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आज का काम कल पर मत टालिए


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सच्ची विद्या अक्षर ज्ञान में नहीं, सद्गुणों से परिपक्व श्रेष्ठ व्यक्तित्व में ही सन्निहित है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो विद्या तुम्हें अहंकार, आलस्य और अनीति की ओर धकेले उसे प्राप्त करने की अपेक्षा अशिक्षित रहना अच्छा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    समय के सदुपयोग का नाम ही पुरुषार्थ है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने कुछ होने का अहंकार ही व्यक्ति को उसके गौरव से वंचित करता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मानव जीवन की सार्थकता के लिए आचार पवित्रता अनिवार्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म- निर्माण के मार्ग पर चलने वाले को परमात्मा अपने आप मिल जाता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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