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  • दिवास्वप्न न देखो। बिना पंख उड़ाने न भरो। वह करो जो आज की परिस्थितियों में किया जा सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भाग्य बनाना अपने हाथ की बात है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की जननी ही नहीं, वह जगज्जननी है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    विश्वाहा वयं सुमनस्यमाताः!
    अर्थात्- हम सदा ही अपने को प्रसन्न रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अज्ञान और कुसंस्कारों से छूटना ही मुक्ति है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर सर्वव्यापक हैं। वे किसी का पक्षपात नहीं करते।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिसके भीतर जितने परिमाण में ईश्वरीय प्रयोजनों में सहयोगी बनने की तड़पन है, वह उतना ही दिव्य आत्मा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जब तक हम ईश्वर की बताई राह पर चलते हैं वह हमारी सहायता करता है। जब कुमार्ग पर चलते हैं तो मुसीबतों में फँसा कर झिड़क देता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना आदर्श उपस्थित करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान की सार्थकता तभी है, जब वह आचरण में आए ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सुनियोजन ही सौन्दर्य है। उसी को कला कौशल भी कहना चाहिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञानदान से बढ़कर आज की परिस्थितियों में और कोई दान नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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