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  • दुष्टों का वैभव बढ़ते देखकर ललचाओं मत। वे गुब्बारे की तरह फूलते और बबूले की तरह फूटते रहते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उपासना उसी की फलित होती है, जो उसे साधना के खाद- पानी से सींचता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    समस्त संसार को मित्र की दृष्टि से देखो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है- ईश्वर प्राप्ति।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    रोग छोटा हो, तो भी उससे सतर्क रहना आवश्यक है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन उसी का सार्थक है जो सदा परोपकार में प्रवृत्त है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वाक्शक्ति का दुरुपयोग न करें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    युग परिवर्तन का पहला कार्य है- अपना परिवर्तन।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान की आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चार मंत्र - व्यस्त रहें- मस्त रहें, सुख बाँटे- दुःख बटायें, मिल- बाँटकर खाएँ, सलाह लें- सम्मान दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सज्जनों की कोई भी साधना कठिनाइयों में से होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आलस्य और दुर्भाग्य एक ही वस्तु के नाम हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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