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  • आत्मा की एकमात्र प्यास भावना की है। उसी के लिए प्राणी प्यासा फिरता है। पग- पग पर मरने वाला मनुष्य उसी सुधासार को पीकर अमर होता है। माता के, पत्नी के, बहिन के, पुत्री के चार थनों से नारी रूपी कामधेनु अपने बछड़े मनुष्य को इसी प्रेमामृत का पयपान कराती है और उसकी अतृप्ति को तृप्ति में बदल देती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    साधना का अर्थ है- कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए भी सत्प्रयास जारी रखना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उपासना उसी की फलित होती है, जो उसे साधना के खाद- पानी से सींचता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नर और नारी दोनों ही वर्ग वेदमाता गायत्री के कन्या और पुत्र हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म निर्माण ही युग निर्माण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् उन्हें ही सर्वाधिक प्यार करते हैं, जो तप- साधना की आत्म- प्रवंचना में न डूबे रहकर सेवा- साधना को सर्वोपरि मानते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ऐसा साहस ही अध्यात्म है, जो आदर्श जीवन जीने की गति- विधियों का निर्माण करे और उसी रास्ते पर उत्साहपूर्वक घसीट ले चले।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सफलता की एक अनिवार्य शर्त है- ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    विपरीत परिस्थितियों में भी हँसी- खुशी का जीवन बिताने का अभ्यास व्रत कहलाता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    प्यार और सहकार से भरा- पूरा परिवार ही इस धरती का स्वर्ग होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गलती को मानना और उसे सुधारना ही आत्मोन्नति का सन्मार्ग है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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