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  • परिश्रम ही स्वस्थ जीवन का मूलमंत्र है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वृक्ष धूप, शीत सहते रहते हैं, पर दूसरों को छाया, लकड़ी और फल- फूल बिना किसी प्रतिफल की आशा के मनुष्यों से लेकर पशु पक्षियों तक को बाँटते रहते हैं। क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते बुद्धिमानी की निशानी उपलब्ध साधन और समय का श्रेष्ठतम उपयोग करना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों के उपकार को स्मरण रखना सज्जनता का प्रथम चिह्न है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने कार्यों में व्यवस्था, नियमितता, सुन्दरता, मनोयोग तथा जिम्मेदारी का ध्यान रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्म ही पूजा है और कर्तव्यपालन भक्ति है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    लोग प्रशंसा करते है या निन्दा इसकी चिन्ता छोड़ो। सिर्फ एक बात सोचो कि ईमानदारी से जिम्मेदारियाँ पूरी की गईं या नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गृहस्थ धर्म में मनुष्य अपनी दिन- दिन की खुदगर्जी के ऊपर अंकुश लगाता जाता है, आत्म संयम सीखता और स्त्री- पुरुष, संबंधी, परिजन आदि में अपनी आत्मीयता बढ़ाता जाता है। यही उन्नति धीरे- धीरे आगे बढ़ती जाती है और मनुष्य संपूर्ण चर- अचर में जड़- चेतन में आत्म सत्ता को ही समाया देखता है। उसे परमात्मा की दिव्य ज्योति जगमगाती दीखती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हमारा कर्तव्य है कि हम जिसे सही समझते है, निर्भय होकर करते रहें। जिसे गलत समझते हैं, उसके आगे किसी भी कीमत पर न झुकें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    विवेक एवं ज्ञान भारतीय संस्कृति की आत्मा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जमाना तब बदलेगा, जब हम स्वयं बदलेंगे।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन का अर्थ है -  समय जो जीवन से प्यार करते हों, वे आलस्य में समय न गँवाए


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कुविचारों, दुर्भावनाओं, काम, क्रोध, लोभ और मोह के बंधनों को तोड़ डालने का नाम ही मुक्ति है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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