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  • सन्ध्योपासना मनुष्य का परम आवश्यक धर्म कर्तव्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी का स्वरूप स्फटिक मणि की तरह स्वच्छ है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भावना से कर्तव्य बड़ा होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पाप अपने साथ रोग, शोक, पतन और संकट लेकर आता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन एक परीक्षा है। उसे परीक्षा की कसौटी पर सर्वत्र कसा जाता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी की क्षमता का सदुपयोग हो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार वस्तुतः एक पवित्र संयुक्त संगठन है। उसकी सुव्यवस्था पारस्परिक सद्भाव- सहकार की बहुलता से ही बन पड़ती है। सभी सदस्य कर्तव्यपालन पर अधिक ध्यान दें और अधिकार उपलब्ध करने की जितनी सुविधा मिले, उसी में से किसी प्रकार काम चलाने का प्रयत्न करें। अपनी अपेक्षा दूसरों की सुविधा का अधिक ध्यान रखने पर ही किसी समुदाय में मैत्री, आत्मीयता एवं सहकार के सद्भाव विकसित होते हैं, जिनके बिना जीवन शून्य प्रतीत होता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    घण्टों निरर्थक बकवास करने से एक क्षण का वह वचन अच्छा, जिससे किसी को धैर्य, प्रोत्साहन या कल्याण की प्राप्ति हो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    समाज सुधार सुशिक्षितों का अनिवार्य धर्म - कर्तव्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हर परिस्थिति में प्रसन्न रहिए, निर्भय रहिए और कर्तव्य करते रहिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    साधना का अर्थ है- कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए भी सत्प्रयास जारी रखना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म निर्माण का अर्थ है भाग्य निर्माण।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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