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  • परिवार में मतभेद होने पर भी अथवा परिहास में भी अशिष्टता को स्थान न दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी ही संस्कृति की संरक्षिका है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में रखकर महात्वाकांक्षाएँगढ़ने वाला दुखी रहता और उपहास सहता है ।।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार एक पूरा समाज, एक पूरा राष्ट्र है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दुनिया की निन्दा स्तुति की परवाह मत करो। हृदय टटोलो और उसकी आवाज सुनो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शान्तिकुञ्ज एक विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारी सतयुगी सपनों का महल है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भक्ति वह सूत्र है, जो जीवात्मा को परमात्मा के साथ जोड़कर उसे दिव्य बना देती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    किसी महान् उद्देश्य को न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती, जितनी कि चलने के बाद कठिनाइयों के भय से पीछे हट जाना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा की प्रगति, उन्नति और विभूति की संभावना भगवान् के सान्निध्य में ही संभव होती है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जब तक नारी वस्त्रों में बनाव- श्रृंगार में, फैशन में जेवर- आभूषणों में अपना व्यक्तित्व देखती रहेंगी, पुरुषों के लिए कामिनी बनकर उसकी वासनाओं की तृप्ति के लिए ही अपना जीवन समझती रहेगी या खा- पीकर घर की चहारदीवारी में पड़े रहना ही अपना आदर्श समझेगी, तब तक कोई भी शक्ति, नियम, कानून उसका उद्धार नहीं कर सकेगें। अपने उद्धार के लिए नारी को स्वयं भी जागरूक होना पड़ेगा। मातृत्व के महान् पद की प्रतिष्ठा को पुनः जीवित रखने के लिए उसे सीता, गौरी, मदालसा, देवी दुर्गा, काली की सी शक्ति, क्षमता और कर्तव्य का उत्तरदायित्व ग्रहण करना होगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान कहीं से, किसी से, किसी मूल्य पर मिले; लेना अच्छा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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