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  • दूसरों के उपकार को स्मरण रखना सज्जनता का प्रथम चिह्न है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मोन्नति संसार की किसी भी बड़ी से बड़ी उन्नति से उच्च एवं महनीय होती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म अर्थात् कर्तव्य, फर्ज, ड्यूटी, जिम्मेदारी और ईमानदारी का समुच्चय।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नाक- कान छेदने और उनके चित्र- विचित्र लटकन लटकाने का, पिछड़ेपन का प्रतीक फैशन कोई महिला न अपनाए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी घर के देवालय में अवस्थित एक प्रत्यक्ष देवी है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ऐसे ईश्वर को खोज निकालें । जो चरित्र बन कर साथ- साथ रह सके ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म निर्माण का अर्थ है भाग्य निर्माण।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गंदे चित्र लगाओ मत, नारी को लजाओ मत।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य के पास अपना कहलाने वाला जो कुछ है, वह नारी का अनुदान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सुसंस्कृत परिवार ही महामानवों को गढ़ सकते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो तुम दूसरे से चाहते हो, उसे पहले स्वयं करो।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सन्मार्ग का राजपथ कभी भी न छोड़ें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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