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  • तीन प्रत्यक्ष देवताओं में माता, पिता और गुरू का स्थान है। इन तीनों में माता प्रथम है। यह इसलिए कि मनुष्य को अपने प्रथम उपकारकर्ता के प्रति कृतज्ञतापूर्वक नमन करने का स्मरण सदा ही बना रहे।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान के अभाव में मनुष्य अन्धा रहता है और कर्म के अभाव में पंगा।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार सद्गुणों को विकसित करने की एक प्रयोगशाला है। उसका सही निर्धारण एवं सुसंचालन किया जा सके, तो निश्चय ही उस परिवार में से सुयोग्य- सुशिक्षित नागरिक एवं महामानव निकलते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नम्रता ही सभ्यता का चिह्न है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कलाकार अपने आपको साधता है, किन्तु परिवार निर्माता को एक समूचे समुदाय के, विभिन्न प्रकृति और स्थिति के लोगों का निर्माण करना पड़ता है। इसके लिए धरती जैसी सहनशीलता, पर्वत जैसा धैर्य धारण और सूर्य जैसी प्रखरता का समन्वय सँजोना पड़ता है। इन सद्गुणों के अभाव में सुसंस्कृत- सुसंस्कारी परिवार के निर्माण का संयोग असंभव है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जूठन छोड़ना अन्न देवता का अपमान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    युग निर्माण योजना का आरम्भ दूसरों को उपदेश देने से नहीं, वरन् अपने मन को समझाने से शुरू होगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दुष्टता का प्रतिरोध ईश्वरीय कार्य है। उसमें पाप नहीं, पुण्य ही है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न बरतें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हम क्या करते हैं, इसका महत्त्व कम है, किन्तु हम किस भाव से करते हैं, इसका बहुत महत्त्व है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म का प्रधान चिह्न है - सदाचार एवं कर्तव्यपालन


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नर और नारी दोनों ही वर्ग वेदमाता गायत्री के कन्या और पुत्र हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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