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  • विश्वाहा वयं सुमनस्यमाताः!
    अर्थात्- हम सदा ही अपने को प्रसन्न रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    साहस एवं विधेयात्मक दृष्टिकोण अध्यात्म का पहला पाठ है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर भक्ति का अर्थ है - आदर्शों के प्रति असीम प्यार। असीम का तात्पर्य है- इतना प्रबल कि उसे क्रियान्वित किये बिना रहा ही न जा सके।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान तीन प्रकार से मिल सकते हैं- मनन से, अनुसरण से और अनुभव से


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म अर्थात् कर्तव्य, फर्ज, ड्यूटी, जिम्मेदारी और ईमानदारी का समुच्चय।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग- पग पर शिक्षक है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    विपरीत परिस्थितियों में भी हँसी- खुशी का जीवन बिताने का अभ्यास व्रत कहलाता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाना समाज के उत्थान करने की एक छोटी प्रक्रिया है, उसको क्रियात्मक रूप देने की प्रयोगशाला परिवार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिसके पास जितने सद्गुण हैं, वह उतना ही बड़ा अमीर है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हजार मन सोचने से एक मन करना अच्छा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्म ही पूजा है और कर्तव्यपालन भक्ति है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    किसी को आत्म- विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन देना ही सर्वोत्तम उपहार है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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