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  • जो जन्म- जन्मान्तरों की संचित पशु- प्रवृत्तियों का नियमन कर सकता है, वह योगी है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शिक्षक राष्ट्र मंदिर के कुशल शिल्पी हैं।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वही व्यक्ति है चतुर सुजान, जिसकी हो सीमित संतान।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सत्कर्म ही परमात्मा की वह उपासना है, जिससे वह प्रसन्न होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों के अनुभव से लाभ उठाने वाला बुद्धिमान् है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भावना की उत्कृष्टता को ही प्यार करता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    खोया हुआ धन पाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उत्तम पुस्तकें जाग्रत् देवता हैं। उनके अध्ययन- मनन के द्वारा पूजा करने पर तत्काल ही वरदान पाया जा सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मन का नियन्त्रण मनुष्य का एक आवश्यक कर्तव्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारियों  जागो, अपने को पहचानो


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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           पुरुषार्थ के दो पक्ष हैं- एक श्रम और दूसरा मनोयोग। श्रम में स्फूर्ति और तत्परता होनी चाहिए। मनोयोग में तन्मयता, निष्ठा का समावेश होना चाहिए। अन्यथा इन दोनों का स्तर नहीं बनता और चिह्न पूजा होने जैसी स्थिति बनी रहती है। लकीर पीटते रहने को पुरुषार्थ नहीं बेगार भुगतना कहा जाता है। उसका प्रतिफल भी नहीं के बराबर ही होता है। साधना के क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय पुरुषार्थ चाहिए। साधक की उपासना में सघन श्रद्धा और जीवन प्रक्रिया में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समन्वय होना चाहिये। भजन- पूजन बेगार भुगतने की तरह क्रिया- कृत्य बनकर ही नहीं चलते रहना चाहिये वरन् उसमें सघन निष्ठा का समावेश होना चाहिये।
          साधनात्मक पुरुषार्थ में तीन चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये। प्रथम चरण में उपासना का नियमित और निश्चित होना द्वितीय चरण में व्यक्तित्व में पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश बढ़ना तृतीय चरण में तपश्चर्या की संयम एवं सेवा की शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए। साधक इन्हीं के सहारे सशक्त बनता है। संसार से सम्मान, सहयोग एवं दैवी अनुग्रह का लाभ सहज ही प्राप्त होने लगता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    प्राणिमात्र के हित की दृष्टि से उदारता, सेवा, सहानुभूति, मधुरता का व्यवहार करना ही परमार्थ का सार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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