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  • श्रम और तितिक्षा से शरीर मजबूत बनता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धन नहीं, चरित्र मूल्यवान् है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जवानी का अर्थ है - निर्भयता और कुछ नया करने, नये- नये अनुभव करने की भूख।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पढ़ना तो बहुत जानते हैं, पर यह कोई विरला ही जानता है कि क्या और क्यों पढ़ना चाहिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य जीवन कर्मप्रधान है। भाग्य भी कर्म का ही प्रति- फल है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नर की शक्ति है- नारी।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा की प्रगति, उन्नति और विभूति की संभावना भगवान् के सान्निध्य में ही संभव होती है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भाग्य बनाना अपने हाथ की बात है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भाग्यवादी वह है, जो स्वयं में विश्वास नहीं करता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर भक्त केवल ईश्वर के शासन में रहता है और उसी के निर्देशों पर चलता है। मन की गुलामी उसे छोड़नी पड़ती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अन्तःकरण की सुन्दरता साधना से बढ़ती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दिवास्वप्न न देखो। बिना पंख उड़ाने न भरो। वह करो जो आज की परिस्थितियों में किया जा सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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