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  • आत्मा ही आत्मा का सहायक है। दूसरा और भला कौन सहायक हो सकता है? आत्म- संयम से मनुष्य दुर्लभ सहायता को प्राप्त कर लेता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    संसार को देखने से पहले अपने आपको भी देखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मानवता की सेवा से बढ़कर और कोई काम बड़ा नहीं है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सबके सुख में ही हमारा सुख सन्निहित है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वही उन्नति कर सकता है, जो स्वयं को उपदेश देता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो तुम दूसरों से चाहते हो, उसे पहले तुम स्वयं करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान की आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् दिव्य चेतना के रूप में हैं, उन्हें बिना बताये ही सब कुछ मालूम रहता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सद्बुद्धि रूपी प्रसन्नता हमारे अन्तर में छिपी पडी़ है, उसे प्रेरित- प्रसन्न करते ही कष्टों की निशा समाप्त हो जाती है और आनन्द रूपी सूर्य की किरणें अपने चारों ओर बिखरी हुई दिखाई पड़ती हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मज्ञान ही मनुष्य का सबसे बड़ा गौरव है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वह स्थान मंदिर है, जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक;   किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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