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  • अपने अज्ञान को दूर करके मन- मंदिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान् की सच्ची पूजा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    साधना या आत्म- विकास के क्षेत्र में पुरुष- स्त्री का भेद नहीं है। साधक आत्मा है। उन्हें अपने को पुरुष- स्त्री न समझकर केवल आत्मा ही समझें। लिंग- भेद की दृष्टि से उन पर कोई भी अयोग्यता थोपी जानी व्यर्थ और उपहासजनक है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नाऽकृत्वा सुखमेधते!
    अर्थात्- बिना कर्तव्य किये मनुष्य सुख नहीं प्राप्त करता |


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सच्चा ऐश्वर्य सुख केवल सत्यशील को ही मिलता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान की आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    श्रम से ही जीवन निखरता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अभिमान एक नशा है, जो मनुष्य को अन्धा बना देता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान आत्मा का नेत्र है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कठिनाइयाँ जीवन की कसौटी है, जिसमें मनुष्य के व्यक्तित्व का रूप निखरता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उत्कृष्ट जीवन का स्वरूप है- दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर होना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य एक भटका हुआ देवता है। सही दिशा में चल सके तो उससे बढ़कर श्रेष्ठ और कोई नहीं


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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