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  • जिस प्रकार कुम्हार अपने चाक पर उँगलियों के कौशल से गीली मिट्टी को किसी भी प्रकार के बर्तन में बदल सकता है, उसी प्रकार नारी अपने पिता और परिवार के छोटे- बड़े सभी सदस्यों को इच्छानुरूप ढालने- बदलने में समर्थ है


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मानव समाज रूपी गाड़ी में स्त्री- पुरुष दोनों का समान महत्त्व है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईर्ष्या से नहीं, अध्यवसाय से हम ऊँचे उठ सकते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य मात्र का यह कर्तव्य है कि वह परम आध्यात्मिक शक्ति के रूप में माँ की प्रतिष्ठा प्रदान करें, प्रत्येक नारी में भाव वत्सला नारी का रूप देखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सत्प्रयत्न कभी निरर्थक नहीं होते।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ऐसा साहस ही अध्यात्म है, जो आदर्श जीवन जीने की गति- विधियों का निर्माण करे और उसी रास्ते पर उत्साहपूर्वक घसीट ले चले।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार में मतभेद होने पर भी अथवा परिहास में भी अशिष्टता को स्थान न दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    स्वच्छता सभ्यता का प्रथम सोपान है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने कार्यों में व्यवस्था, नियमितता, सुन्दरता, मनोयोग तथा जिम्मेदारी का ध्यान रखें।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भाग्य को मनुष्य स्वयं बनाता है, ईश्वर नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने कुछ होने का अहंकार ही व्यक्ति को उसके गौरव से वंचित करता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    स्वाध्याय एक वैसी ही आत्मिक आवश्यकता है जैसे शरीर के लिए भोजन।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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