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  • शस्त्र युद्ध में विजय प्राप्त करने की अपेक्षा आत्म- जय करने में अधिक वीरता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मानुशासन और आत्म- संतुलन का अभ्यास ही योग साधना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भक्ति वह सूत्र है, जो जीवात्मा को परमात्मा के साथ जोड़कर उसे दिव्य बना देती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न बरतें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    छिद्रान्वेषण त्यागकर गुण अन्वेषण का स्वभाव बनाएँ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी का पिछड़ापन मनुष्यता का अपराध है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो सचमुच प्रेम करता है उसका हृदय धरती पर साक्षात स्वर्ग है। ईश्वर उसमें बसता है क्योंकि ईश्वर प्रेम है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इस संसार में हर प्रकार के अवसर मौजूद हैं। यहाँ पैरों में चुभने वाले काँटे भी बहुत हैं और सुगन्ध- सुशमा से भरे- पूरे फूलों की भी कमी नहीं। यह निर्धारण करने का संकल्प, प्रयास और अधिकार पूरी तरह अपने हाथ में है।  (वाङ्मय 54, पृ. 1.61)

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    किसी को आत्म- विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन देना ही सर्वोत्तम उपहार है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    बुद्धि को निर्मल, पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने वाला महामंत्र है- गायत्री मंत्र।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गंदे चित्र लगाओ मत, नारी को लजाओ मत।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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