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  • जीवन एक पाठशाला है, जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा प्राप्त करते हैं।                            


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हम जीवन में श्रम को स्थान दें  श्रम को जीवन मन्त्र बनाएँ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार की सेवा करना संसार की सेवा करना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    रोग छोटा हो तो भी उससे सतर्क रहना आवश्यक है।


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    प्रकृति के अनुकूल चलें, स्वस्थ रहें।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चार मंत्र - व्यस्त रहें- मस्त रहें, सुख बाँटे- दुःख बटायें, मिल- बाँटकर खाएँ, सलाह लें- सम्मान दें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सद्बुद्धि अर्थात्- ऋतम्भरा प्रज्ञा, सत्- असत् का विवेक, निर्मलता, सात्विकता, संयम, शिष्टाचार, मृदु व्यवहार, उदारता, धैर्य, साहस, सत्यनिष्ठा आदि गुणों वाली मनोभूमिका। इसको प्राप्त करने से मानव जीवन स्वर्गीय सुख- शान्ति से परिपूर्ण हो जाता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धरती पर स्वर्ग अवतरित करने का प्रारम्भ सफाई और स्वच्छता से करें।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों को पीड़ा न देना ही मानव धर्म है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    खोया हुआ धन पाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य अपने सृजेता की तरह सामर्थ्यवान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर का विश्वास सत्कर्मों की कसौटी पर परखा जा सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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