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    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    विचारों की पवित्रता स्वयं एक स्वास्थ्यवर्धक रसायन है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वही जीवित है, जिसका मस्तिष्क ठण्डा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    देव वे हैं, जो अपने अधिकारों को भूलकर कर्तव्यपालन का ही स्मरण रखते हैं। परमार्थ और परोपकार में अपनी शक्तियों का अधिक त्याग करते हैं और इसी में अपना सच्चा स्वार्थ मानते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जिसका अपने मन पर काबू है, जिसका मन पूर्णतः स्वस्थ है, वह बीमार नहीं पड़ सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    किसने कितनी उन्नति की इसकी सच्ची कसौटी यह है कि उस मनुष्य के दृष्टिकोण और स्वभाव में कितना परिष्कार हुआ?


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    व्यक्तित्व मान्यताओं, आदतों, इच्छाओं का समुच्चय मात्र है। वह इन्हीं तीनों के सहारे गढ़ा गया है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसन्द नहीं।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है; परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    योग का लक्ष्य है- जीवात्मा का विराट् चेतना से सम्पर्क जोड़कर दिव्य आदान- प्रदान का मार्ग खोल देना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सर्वव्यापी ईश्वर की दृष्टि में हमारा गुप्त- प्रकट आचरण या भाव छिप नहीं सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं है; क्योंकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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