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  • अपने को समझे। मल- मूत्र की गठरी को अपना आधार न माने। ईश्वर का अंश पंचतत्त्वों की गठरी में इस लिये बंधा है कि इस उपकरण के सहारे वह अपने अभीष्ट प्रयोजनों को पूरा कर सके। लुहार हथौड़ा नहीं हो सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सत्कर्म ही लोक- परलोक की सुख- शान्ति का श्रेष्ठ साधन है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    श्रम से ही जीवन निखरता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इस विश्व ब्रह्माण्ड में दो शक्ति- सत्ताएँ आच्छादित हैं ।। एक जड़ दूसरी चेतना ।। इन्हीं को प्रकृति और पुरुष भी कहते हैं, स्थूल और सूक्ष्म भी ।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चरित्रवान् व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में भगवद् भक्त हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भावना की उत्कृष्टता को ही प्यार करता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    माली की तरह जियो, जिसके प्रयास की चर्चा खिलते पुष्प हवा में फैलाएँ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म निर्माण का अर्थ है -भाग्य निर्माण।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सद्बुद्धि से बढ़कर और कोई सम्पत्ति इस संसार में नहीं

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भाग्यवाद हमें नपुंसक और निर्जीव बनाता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शिष्टता सभ्यता की आधारशिला है ओर अशिष्टता अनगढ़पन की प्रतिक्रिया।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अन्तःकरण को अशुद्ध वासनाओं से बचाए रखिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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