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    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    असत् से सत् की ओर, अन्धकार से आलोक की ओर और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम साधना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार वस्तुतः एक पवित्र संयुक्त संगठन है। उसकी सुव्यवस्था पारस्परिक सद्भाव- सहकार की बहुलता से ही बन पड़ती है। सभी सदस्य कर्तव्यपालन पर अधिक ध्यान दें और अधिकार उपलब्ध करने की जितनी सुविधा मिले, उसी में से किसी प्रकार काम चलाने का प्रयत्न करें। अपनी अपेक्षा दूसरों की सुविधा का अधिक ध्यान रखने पर ही किसी समुदाय में मैत्री, आत्मीयता एवं सहकार के सद्भाव विकसित होते हैं, जिनके बिना जीवन शून्य प्रतीत होता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं, वरन् शक्ति है। उत्कृष्ट आदर्श- वादी आस्थाओं, आकांक्षाओं के रूप में ही उसकी अनुभूति की जा सकती है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सन्ध्योपासना मनुष्य का परम आवश्यक धर्म कर्तव्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कलाकार अपने आपको साधता है, किन्तु परिवार निर्माता को एक समूचे समुदाय के, विभिन्न प्रकृति और स्थिति के लोगों का निर्माण करना पड़ता है। इसके लिए धरती जैसी सहनशीलता, पर्वत जैसा धैर्य धारण और सूर्य जैसी प्रखरता का समन्वय सँजोना पड़ता है। इन सद्गुणों के अभाव में सुसंस्कृत- सुसंस्कारी परिवार के निर्माण का संयोग असंभव है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इक्कीसवीं सदी- नारी सदी।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान के अभाव में मनुष्य अन्धा रहता है और कर्म के अभाव में पंगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गृहस्थाश्रम ही समाज के संगठन, मानवीय मूल्यों की स्थापना, समाज निष्ठा, भौतिक विकास के साथ- साथ मनुष्य के आध्यात्मिक- मानसिक विकास का क्षेत्र है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्मणि त्यज्यते प्रज्ञा।
    अर्थात्- कर्म में ही मनुष्यों की प्रज्ञा की अभिव्यक्ति होती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है, जैसे कपड़ों को कीड़ा


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर एक प्रकाश है, जो हमें न्यायनिष्ठ, विवेकशील और कर्तव्यनिष्ठ बनने के लिए मार्गदर्शन करता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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