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  • यदि उत्कट इच्छा और अदम्य भावना हो, तो मनुष्य बहुत कुछ बन सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    महापुरुषों में ही महापुरुष उत्पन्न करने की क्षमता होती है। हाथियों के समूह में ही हाथी बढ़ते और पलते हैं। मूषक तो कुतरने वाली बिरादरी में ही बढ़ते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    वृक्ष धूप, शीत सहते रहते हैं, पर दूसरों को छाया, लकड़ी और फल- फूल बिना किसी प्रतिफल की आशा के मनुष्यों से लेकर पशु पक्षियों तक को बाँटते रहते हैं। क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते बुद्धिमानी की निशानी उपलब्ध साधन और समय का श्रेष्ठतम उपयोग करना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म- निर्माण का ही दूसरा नाम भाग्य निर्माण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य की आत्मा में जो श्रेष्ठता है, वह कभी मर नहीं सकती।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी की अवमानना का अर्थ है- अपनी उद्गम शक्ति की गरिमा को गिराना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म का मार्ग फूलों की सेज नहीं, इसमें बड़े- बड़े कष्ट सहन करने पड़ते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    असत् से सत् की ओर, अन्धकार से आलोक की ओर और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम साधना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अभिमान एक नशा है, जो मनुष्य को अन्धा बना देता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मानवता की सेवा से बढ़कर और कोई काम बड़ा नहीं हो सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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