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  • अपने कुविचारों, कुसंस्कारों एवं दुःस्वप्नों का शोधन ही प्रत्याहार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अध्यात्मवाद, जीवन का वह तत्त्वज्ञान है, जिसके ऊपर हमारी भीतरी और बाहरी उन्नति, समृद्धि एवं सुख- शान्ति निर्भर है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    माता का स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ब्रह्मचर्य ही जीवन है, तेज है, शक्ति है और सामर्थ्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    महात्मा बुद्ध का कथन है कि अन्तःकरण भी एक मुख है। दर्पण में हम अपना मुख देखते हैं तथा सौन्दर्य देखकर प्रमुदित होते हैं। हमारे मुँह पर यदि धब्बे या कालौंच आदि होती है तो उसे भी सप्रयास छुटाने की चेष्टा करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इस अन्तःकरण रूपी मुख को भी हम नित्यप्रति चेतना के दर्पण में देखें- परखें और उसके सौन्दर्य में अभिवृद्धि करें। आत्मनिरीक्षण करके देखें कि किन- किन कषाय कल्मषों ने आत्मा के अनन्त सौन्दर्य को आच्छादित कर रखा है। कामनाओं और वासनाओं ने कहीं उसे पथ- भ्रष्ट तो नहीं कर रखा? आशा और तृष्णा रूपी भयंकर ग्रहोने अपने चंगुल में उसे जकड़ तो नहीं रखा? जब इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ में मिलने लगेगा तो व्यक्ति तुच्छ से महान, लघु से विराट् और नर से नारायण बन जायेगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चरित्रवान् व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में भवगद् भक्त हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भावना से कर्तव्य बड़ा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    श्रेष्ठता और संस्कृति का पहला गुण स्वच्छता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सन्मार्ग का राजपथ कभी भी न छोड़ें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गृहस्थ धर्म में मनुष्य अपनी दिन- दिन की खुदगर्जी के ऊपर अंकुश लगाता जाता है, आत्म संयम सीखता और स्त्री- पुरुष, संबंधी, परिजन आदि में अपनी आत्मीयता बढ़ाता जाता है। यही उन्नति धीरे- धीरे आगे बढ़ती जाती है और मनुष्य संपूर्ण चर- अचर में जड़- चेतन में आत्म सत्ता को ही समाया देखता है। उसे परमात्मा की दिव्य ज्योति जगमगाती दीखती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गुण ही नारी का सच्चा आभूषण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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