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  • सच्चरित्रता संसार की सर्वोपरि सम्पत्ति है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना स्वर्ग स्वयं ही बनाएँ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने दोषों की ओर से अनजान रहने से बढ़कर प्रमाद और कोई नहीं हो सकता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हँसती- हँसाती जिन्दगी ही सार्थक है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    प्यार और सहकार से भरापूरा परिवार ही धरती का स्वर्ग होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सच्चा आनन्द उसे मिलता है, जिसने अपने मन को जीत लिया। मन को जीतने का अर्थ है- उसे कुमार्ग पर चलने से मोड़कर सन्मार्ग में प्रवृत्त कर देना। मन के सन्मार्ग पर चलने की पहचान है- गुण, कर्म, स्वभाव में सहिष्णुता की वृद्धि होना, सद्विचारों, सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों एवं सत्कर्मों का बढ़ना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन का हर क्षण उज्ज्वल भविष्य की संभावना लेकर आता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मा की उत्कृष्टता संसार की सबसे बड़ी सिद्धि है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    माता से बड़ा और कोई देवता नहीं है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जब कभी जिस किसी के जीवन में मार्ग निर्धारण की उमंग उठे और उस वेला में उत्कृष्टता के अवलम्बन की स्फुरणा उठे, तो समझना चाहिए वह स्वयं धन्य हुआ और ईश्वर ने अपने निवास के लिए जिस चोले का चुनाव किया था, वह चुनाव भी बुद्धिमत्तापूर्ण सिद्ध हुआ।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन जीना, आदर्श और उद्देश्य के लिए संग्राम करना है। जीवन जागरण की धारा है। जब तक जियो प्रतिज्ञाबद्ध जियो। अपने जीवन का सच्चा उद्देश्य तलाश करो और जब एक बार उसे जान लो तो उसे प्राप्त करने के लिए जुट जाओ। जियो और विजय प्राप्त करो। (अखण्ड ज्योति-१९४०, अक्टूबर १)


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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