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  • दिवा स्वप्र न देखो। बिना पंख के उड़ाने न भरो। वह करो जो आज की परिस्थितियों में किया जा सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कदम है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    तलवार की कीमत म्यान से नहीं, बल्कि धार से होती है। इसी प्रकार मनुष्य की कीमत धन से नहीं सदाचार से ऑंकी जाती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईर्ष्या और द्वेष की आग में जलने वाले अपने लिए सबसे बड़े शत्रु हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिवार एक पाठशाला है, जहाँ गुण- कर्म को उच्च स्तरीय बनाने एवं व्यक्तित्व को गौरवशाली बनाने का पाठ पढ़ा जाता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मशुद्धि का प्रत्यक्ष चिह्न सेवा एवं परमार्थ में रुचि होना ही है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नारी की अवमानना का अर्थ है- अपनी उद्गम शक्ति की गरिमा को गिराना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म निर्माण का अर्थ है भाग्य निर्माण।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    यदि मनुष्य सीखना चाहे, तो उसकी प्रत्येक भूल उसे कुछ न कुछ सिखा देती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    माता का स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है, जैसे कपड़ों को कीड़ा


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    स्वयं उत्कृष्ट बनिए और दूसरों को श्रेष्ठ बनाइए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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