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  • विचारों की पवित्रता स्वयं एक स्वास्थ्यवर्धक रसायन है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है; परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अध्यात्मवाद वह महाविज्ञान है, जिसकी जानकारी के बिना भूतल के समस्त वैभव निरर्थक हैं और जिसके थोडा़- सा भी प्राप्त होने पर जीवन आनन्द से ओतप्रोत हो जाते है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म- निर्माण का ही दूसरा नाम भाग्य निर्माण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    संयम के बिना जीवन का विकास नहीं होता। जीवन के सितार पर हृदयमोहक मधुर संगीत उसी समय गूँजता है, जब उसके तार नियम तथा संयम से बँधे होते है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् का अनुग्रह जहाँ साथ है, वहाँ असंभव जैसी कोई चीज शेष नहीं रह जाती।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने दृष्टिकोण को उत्कृष्टता के साथ जोड़ देना योग है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परोपकार करना दूसरों की सेवा करना और उसमें जरा भी अहंकार न करना यही सच्ची शिक्षा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    स्वर्ग शब्द में जिन गुणों का बोध होता है, सफाई और शुचिता उनमें सर्वप्रमुख है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् वह नहीं है, जो मन की मनोकामनाओं को पूरा करता है; बल्कि भगवान् वह है, जो मन से मनोकामनाओं का नाश करता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है, जैसे कपड़ों को कीड़ा


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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           पुरुषार्थ के दो पक्ष हैं- एक श्रम और दूसरा मनोयोग। श्रम में स्फूर्ति और तत्परता होनी चाहिए। मनोयोग में तन्मयता, निष्ठा का समावेश होना चाहिए। अन्यथा इन दोनों का स्तर नहीं बनता और चिह्न पूजा होने जैसी स्थिति बनी रहती है। लकीर पीटते रहने को पुरुषार्थ नहीं बेगार भुगतना कहा जाता है। उसका प्रतिफल भी नहीं के बराबर ही होता है। साधना के क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय पुरुषार्थ चाहिए। साधक की उपासना में सघन श्रद्धा और जीवन प्रक्रिया में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समन्वय होना चाहिये। भजन- पूजन बेगार भुगतने की तरह क्रिया- कृत्य बनकर ही नहीं चलते रहना चाहिये वरन् उसमें सघन निष्ठा का समावेश होना चाहिये।
          साधनात्मक पुरुषार्थ में तीन चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये। प्रथम चरण में उपासना का नियमित और निश्चित होना द्वितीय चरण में व्यक्तित्व में पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश बढ़ना तृतीय चरण में तपश्चर्या की संयम एवं सेवा की शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए। साधक इन्हीं के सहारे सशक्त बनता है। संसार से सम्मान, सहयोग एवं दैवी अनुग्रह का लाभ सहज ही प्राप्त होने लगता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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