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  • सांसारिक वासना को तुम भयानक रोग की तरह समझो, संयम को औषधि की तरह समझो। वासनारहित जीवन ही स्वस्थ जीवन है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर दिव्य चेतना है, अतः सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों के रूप में ही उसे देखा जा सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन को सार्थक एवं पूर्ण बनाने का अभ्यास स्थल है- परिवार।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सद्विचार ही स्वर्ग और कुविचार ही नरक है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    संसार में विद्या से बढ़कर कोई मित्र नहीं और अविद्या से बढ़कर कोई शत्रु नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अच्छाई का एक छोटा अंकुर उगा हो तो उसकी सुरक्षा और सिंचाई का ध्यान रखें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म शब्द का अर्थ है- धारणा। यहाँ धारणा से तात्पर्य उन आदर्शों की अंतरंग से प्रतिष्ठापना से है, जो व्यक्ति और समाज की श्रेष्ठता और सद्भावना की दिशा में प्रेरित करते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना मूल्य न गिरने पाये यह सतर्कता जिसमें जितनी पाई जाती है, वह उतना ही प्रगतिशील है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्मसुधार में तपस्वी, परिवार निर्माण में मनस्वी और समाज परिवर्तन में तेजस्वी की भूमिका निबाहें। अनीति के वातावरण में मूकदर्शक बनकर न रहें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सामूहिक हित को महत्त्व दीजिए, व्यक्ति स्वार्थ को नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दुनिया की निन्दा स्तुति की परवाह मत करो। हृदय टटोलो और उसकी आवाज सुनो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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