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  • जो तुम दूसरों से चाहते हो, उसे पहले तुम स्वयं करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    तुम्हें दया और सेवा करने के लिए भेजा गया है। सताने और छीनने के लिए नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान कहीं से, किसी से, किसी मूल्य पर मिले, लेना अच्छा है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पढ़ना, ज्ञान के नेत्र खोलने के लिए होता है;  नौकरी के लिए नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    रोग छोटा हो, तो भी उससे सतर्क रहना आवश्यक है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों की निन्दा करके किसी को कुछ नहीं मिला, जिसने अपने को सुधारा उसने बहुत कुछ पाया।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शान्तिकुंज  एक विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारी सतयुगी सपनों का महल है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    यदि भवसागर से पार होने की इच्छा है, तो सर्वप्रथम ज्ञान संचय का प्रयत्न करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अश्लील चिन्तन और लोलुप दृष्टिकोण मानसिक व्यभिचार है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शिक्षा का स्थान स्कूल हो सकते हैं, पर दीक्षा का स्थान तो घर ही है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग कीजिए।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    समुन्नत- सुसंस्कृत नारी अपने पारिवारिक राज्य में स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में पूरी समर्थ है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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