The greatest among all the acts of bravery is the one in which we can earn the credit of correcting our own unrefined nasty habits. Other people could well help us when confronting with outside struggles or resolving others’ difficulties and they can also get us credit in one way or another. However, we will have to depend solely on our own personal efforts in carrying out the task of correcting our unworthy habits. For that reason, it has been designated as a mighty endeavor and anyone who undertakes it would aptly be called as a brave person in a real sense. 

By Pandit Shriram Sharma Acharya
Share on Google+ Email

एकला चलो रे
हम अकेले चलें। सूर्य- चन्द्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हों। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे- सुने अनुसार नहीं, वरन् अपने स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें। सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें। सहीं को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही हमारे युग- निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूंजी है, जिसके आधार पर हम युग साधना की वेला में ईश्वरीय प्रदत्त उत्तरदायित्व का सहीं रीति से निर्वाह कर सकेंगे


By Pandit Shriram Sharma Acharya
Share on Google+ Email


SOHUM (I am That): Indeed potentially I am That Absolute Truth  - Consciousness incarnated in human form. Attaining higher spiritual levels are easy for me. I am a Sadhak (devotee) whom Yug Rishi has given an opportunity to do Sadhana towards Self-Realization.

By Pandit Shriram Sharma Acharya
Share on Google+ Email

अमीरी का सम्मान यह हमारा एक ऐसा दूषित सामाजिक दृष्टिकोण है जिसके कारण लोग अनुचित रीति से भी धन कमाने में संकोच नहीं करते। धनी लोग अपने धन के द्वारा सुख भोगें, इसमें हर्ज नहीं, पर उन्हें इसी कारण सम्मान मिले कि वे धनी हैं, तो यह अनुचित है। सम्मान केवल परमार्थी और सदाचारी लोगों के लिए सुरक्षित रहना चाहिए।


By Pandit Shriram Sharma Acharya
Share on Google+ Email

सहृदयता मानवीय गरिमा का मेरुदण्ड है।जिसका सम्बल पाकर ही व्यक्ति एवं समाज ऊंचे उठते, मानवी गुणों से भरे-पुरे बनते हैं। इसका अभाव निष्ठुरता, कठोरता, असहिष्णुता जैसी प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट होता है।मानवी गरिमा के टुटते हुए इस मेरुदण्ड को हर कीमत पर बचाया जाना चाहिये। 



By Pandit Shriram Sharma Acharya
Share on Google+ Email