The greatest among all the acts of bravery is the one in which we can earn the credit of correcting our own unrefined nasty habits. Other people could well help us when confronting with outside struggles or resolving others’ difficulties and they can also get us credit in one way or another. However, we will have to depend solely on our own personal efforts in carrying out the task of correcting our unworthy habits. For that reason, it has been designated as a mighty endeavor and anyone who undertakes it would aptly be called as a brave person in a real sense. 

By Pandit Shriram Sharma Acharya
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एकला चलो रे
हम अकेले चलें। सूर्य- चन्द्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हों। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे- सुने अनुसार नहीं, वरन् अपने स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें। सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें। सहीं को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही हमारे युग- निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूंजी है, जिसके आधार पर हम युग साधना की वेला में ईश्वरीय प्रदत्त उत्तरदायित्व का सहीं रीति से निर्वाह कर सकेंगे


By Pandit Shriram Sharma Acharya
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अपनी असलियत हम जितनी अच्छी तरह जान सकते हैं दूसरे उतनी नहीं। सो दोषों की निन्दा और उनके उन्मूलन की चेष्टा हमें अपने आप से आरंभ करनी चाहिए, क्योंकि अपने निकटतम समीपवर्ती हम स्वयं ही हैं। अपने ऊपर अपना जितना प्रभाव और दबाव है उतना और किसी पर नहीं, इसलिए यदि सुधारने का काम आरंभ करना हो तो ऐसे व्यक्ति से आरंभ करना चाहिए जो अपने अधिकतम निकट और अधिकतम प्रभाव, दबाव में हो, ऐसे व्यक्ति हम स्वयं ही हो सकते हैं।



By Pandit Shriram Sharma Acharya
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जब समुद्र मथा गया था तो उसमें से सबसे पहले विष, फिर वारुणी, उसके बाद अन्य रत्न निकले थे। युग निर्माण के लिए, मूर्छित समाज को जाग्रत करने के लिए भी गायत्री संस्था द्वारा वह अमृत निकालने के लिए समुद्र- मंथन का कार्य हो रहा है, जिसे पीने से यहाँ के निवासी इस देवभूमि को अमरों, भूसुरों की निवास- स्थली प्रत्यक्ष रूप में दिखा सकें।
यह समुद्र- मंथन ठीक प्रकार से चल रहा है या नहीं, इसकी प्रारम्भिक परीक्षा यही है कि इसमें कितना विष निकलता है, यह देखा जाय, जब सड़ी हुई कीचड़ की नाली साफ की जाती है तो उसमें से नाक फाड़ने वाली बदबू उड़ती है। दुर्बुद्धि की, संभावनाओं की, स्वार्थपरता और पाखण्ड की कीचड़, बहुत दिनों से हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में पड़ी सड़ रही है, उसे साफ किया जा रहा है तो वे तत्व जिनके स्वार्थों को हानि पहुँचती है, स्वभावतः विरोध करेंगे। असुरता को नष्ट करने वाले जब कभी भी अभियान हुए हैं, उनके प्रतिरोध के लिए असुरों ने पूरी शक्ति से प्रत्याक्रमण किये हैं।


By Pandit Shriram Sharma Acharya
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आगामी दिनों प्रज्ञावतार का कार्य विस्तार होने वाला है। उस काम की जिम्मेदारी केवल ब्राह्मण तथा संत ही पूरा कर सकते हैं। आपको इन दो वर्गों में आकर खड़ा हो जाना चाहिए तथा प्रज्ञावतार के सहयोगी बनकर उनके कार्य को पूरा करना चाहिए। अगर आप अपने खर्च में कटौती करके तथा समय में से कुछ बचत करके इस ब्राह्मण एवं संत परम्परा को जीवित कर सकें, तो आने वाली पीढ़ियाँ आप पर गर्व करेंगी। अगर समस्याओं के समाधान करने के लिए खर्चे में कुछ कमी आती है, तो हम आपको सहयोग करेंगे।

सितम्बर- १९८० शांतिकुंज में उद्बोधन


By Pandit Shriram Sharma Acharya
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