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    हम अकेले चलें। सूर्य- चन्द्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हों। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे- सुने अनुसार नहीं, वरन् अपने स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें। सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें। सहीं को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही हमारे युग- निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूंजी है, जिसके आधार पर हम युग साधना की वेला में ईश्वरीय प्रदत्त उत्तरदायित्व का सहीं रीति से निर्वाह कर सकेंगे


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भले ही मनुष्य अपने पापों को किसी भी तरह अनेक तर्क, युक्तियाँ लगाकर टालता रहे, किन्तु अंत में समय आने पर उसे ही पाप का फल भोगना पड़ता है। पाप जिसने किया है, उसी को भोगना पड़ता है, दूसरे को नहीं। यह मनुष्य की भूल है कि वह तरह- तरह की युक्तियों से पाप से बचना चाहते हैं। अतः जो किया, उसका आरोप दूसरे पर न करते हुए स्वयं को भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पूर्णतः पाक साफ, दूध का धुला हुआ कोई नहीं होता। भूलें, बुराइयाँ, पाप हो जाना मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी है। प्रत्येक मनुष्य पैदा होने से मरने तक कोई न कोई बुरा काम कर ही बैठता है। गिरकर उठने में, बुराई से भलाई की ओर आगे बढ़ने में ही मनुष्य की श्रेष्ठता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    महत्त्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने लिए विशेष लाभ भले ही प्राप्त कर लेते हों, पर जन- समाज के लिए वे संकट रूप ही बने रहते हैं। वित्तैषणा, पुत्रैषणा और लोकेषणा की तृष्णा, वासना की अहन्ता से क्षुब्ध हुए मनुष्य उन पागलों का रूप धारण कर लेते हैं जो न स्वयं चैन से रहते हैं और न दूसरों को चैन से रहने देते हैं। तृष्णा तो हर सफलता के बाद आग में घी डालने की तरह बढ़ती जाती है। इसलिए जिन्हें निरन्तर लालसाओं, कामनाओं की आग में झुलसना हो, उन्हें अपनी मनोभूमि में जीवित चिता सँजो लेनी चाहिए।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ऐसा विचार मत करो कि उसका भाग्य उसे जहाँ- तहाँ भटका रहा है और इस रहस्यमय भाग्य के सामने उसका क्या बस चल सकता है। उसको मन से निकाल देने का प्रयत्न करना चाहिए। किसी तरह के भाग्य से मनुष्य बड़ा है और बाहर की किसी भी शक्ति की अपेक्षा प्रचण्ड शक्ति उसके भीतर मौजूद है, इस बात को जब तक वह नहीं समझ लेगा, तब तक उसका कदापि कल्याण नहीं हो सकता।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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