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    हम अकेले चलें। सूर्य- चन्द्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हों। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे- सुने अनुसार नहीं, वरन् अपने स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें। सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें। सहीं को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही हमारे युग- निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूंजी है, जिसके आधार पर हम युग साधना की वेला में ईश्वरीय प्रदत्त उत्तरदायित्व का सहीं रीति से निर्वाह कर सकेंगे


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गंगा गोमुख से निकलती है और यमुना यमुनोत्री से, नर्मदा का अवतरण अमरकण्टक के एक छोटे से कुण्ड से होता है।मान सरोवर से ब्रह्मपुत्र निकलती है।शान्तिकुंज ऐसे अनेकों प्रवाहों को प्रवाहित कर रहा है, जिसका प्रभाव न केवल भारत को वरन् समूचे विश्व को एक नई दिशा में घसीटता हुआ ले जाएगा।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् को इष्ट देव बनाकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इष्ट का अर्थ है- लक्ष्य। हम भगवान् के समतुल्य बनें। उसी की जैसी उदारता, व्यापकता, व्यवस्था, उत्कृष्टता, तत्परता अपनाएँ, यही हमारी रीति- नीति होनी चाहिए। इस दिशा में जितना मनोयोगपूर्वक आगे बढ़ा जाएगा उसी अनुपात से ईश्वरीय संपर्क का आनंद और अनुग्रह का लाभ मिलेगा।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हमारे प्रेमी- परिजन लोभ- मोह के जाल से जिस हद तक निकल सकें, निकलने के लिए पूरा जोर लगाएँ। भौतिक और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की कीचड़ से निकलकर विश्व- मानव की आराधना के लिए त्याग- बलिदान भरा अनुदान अधिक से अधिक मात्रा में उत्पन्न करें।
    पश्चिम का भोगवाद जिस अग्नि में- तेजाबी तालाब में जलता- कलपता, निष्ठुर स्वार्थपरता की कीचड़ में डूबा विकल, संत्रस्त दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे भारतीय अध्यात्म ही भावसंवेदना की गंगोत्री में स्नान कराके मुक्ति दिलाएगा। इक्कीसवीं सदी भाव- संवेदनाओं के उभरने- उभारने की अवधि है। हमें इस उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा- भरा बनाने में निष्ठावान माली की भूमिका निभानी चाहिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    बुरे विचारों से बचने के लिए अवांछनीय साहित्य का पढ़ना बंद कर देना अधूरा उपचार है। उपचार पूरा तब होता है, जब उसके स्थान पर सद्साहित्य का अध्ययन किया जाय। मानव मस्तिष्क कभी खाली नहीं रह सकता। उसमें किसी न किसी प्रकार के विचार आते ही रहते हैं। बार- बार निषेध करते रहने से किन्हीं गंदे विचारों का तारतम्य तो टूट सकता है, किन्तु उनसे सर्वथा मुक्ति नहीं मिल सकती। अवांछनीय विचारों से पूरी तरह बचने का सबसे सफल उपाय यह है कि मस्तिष्क में सद्विचारों को स्थान दिया जाये। असद्विचारों के रहने से बुरे विचारों को प्रवेश पाने का अवसर ही मिलेगा।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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