• हमारा जीवन कैसा हो ?
  • अपने अंग अवयवों से !
  • हमारा युग निर्माण सत्संकल्प
  • Solemn Pledge ,Yug Nirman Satsankalpa
  • क्रान्तिधर्मी साहित्य महत्ता
  • युग निर्माण योजना- एक दृष्टि में
  • हमारे जीवन से कुछ सीखे-1
  • हमारे जीवन से कुछ सीख-2
  • या तो अभी या कभी नहीं
  • विचार क्रांति के बीजों से
  • महाकाल के तेवर समझें
  • हमारे जीवन से कुछ सीखें
  • त्रिवेणी संगम
  • अंतिम संदेश-परम पूज्य गुरुदेव
  • अंतिम संदेश- वंदनीया माताजी
  • या तो अभी या कभी नहीं
  • जर्जर महान आये दिन गिरते रहते हैं पर भवन कितने ही विशालकाय हो यदि आधार स्तम्भ सुदृढ़ हो तो वे भयंकर भूचालों में भी अविचलित खड़े रहते हैं। तूफान हो झंझावात हों, समुद्र गहरा हो तो भी कुशल माँझी नाव किनारे पहुँचा देते हैं। युद्ध कितना ही भीषण हो, अनेक मोर्चों पर लड़ा जा रहा हो तो भी साहसी और सूझबूझ वाले सेनापति जियी होते हैं, यश प्राप्त करते हैं। कुल चौदह किन्तु मूर्धन्य व्यक्तियों से बनी निहत्थी काँग्रेस ने ब्रिटिश हुकूमत से सत्ता छीन ली थी। अपने शाँति कुँज को इन दिनों एक सौ वैसे ही सुदृढ़ आधार स्तम्भों की, कुशल नाविकों की, साहसी सेनापतियों और मूर्धन्यों की आवश्यकता है। जागृत आत्मायें इस पुकार को सुने-समझे और युग धर्म निर्वाह के लिए आगे आयें। माँ की कोख कलंकित करने वाली कायरता तो न दिखायें।

    जिनके मन में राष्ट्रीयहित, सेवा भावना और जातीय स्वाभिमान हो, शिथिल हों किन्तु जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व बहुत

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    अस्सी वर्ष जी गई लम्बी सोद्देश्य शरीर यात्रा पूरी हुई ।। इस अवधि में परमात्मा को हर पल अपने हृदय और अंतःकरण में प्रतिष्ठित मान एक- एक क्षण का पूरा उपयोग किया है ।। शरीर अब विद्रोह कर रहा है ।। यूँ उसे कुछ दिन घसीटा भी जा सकता है, पर जो कार्य परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता ने सौंपे हैं, वे सूक्ष्म और कारण शरीर से ही सम्पन्न हो सकते हैं ।। ऐसी स्थिति में कृशकाय शरीर से मोह का कोई औचित्य भी नहीं है ।।

    ज्योति बुझ गई यह भी नहीं समझा जाना चाहिए ।। अब तक के जीवन

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    महाकाल के तेवर समझें, दण्ड के नहीं- पारितोषिक के पात्र बनें

    साहस ने हमें पुकारा है। समय ने, युग ने, कर्तव्य ने, उत्तरदायित्व ने, विवेक ने, पौरुष ने हमें पुकारा है। यह पुकार अनसुनी न की जा सकेगी। आत्मनिर्माण के लिए, नव निर्माण के लिए हम काँटों से भरे रास्तों का स्वागत करेंगे और आगे बढ़ेंगे। लोग क्या कहते और क्या करते हैं, इसकी चिन्ता कौन करे ??

    अपनी आत्मा ही मार्गदर्शन के लिए पर्याप्त है। लोग अँधेरे में भटकते हैं- भटकते रहें, हम अपने विवेक के प्रकाश का अवलम्बन कर स्वत:

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    विचार क्रांति के बीजों से क्रांति की केसरिया फसल लहलहा उठे-

    (जीवट है, तो महाक्रान्ति की चिनगारी को आग और आग को दावानल बनने में सहयोग दें)

    युग बदलने के लिए बहुत बड़े काम करने पड़ेंगे; परन्तु यह काम नौकरों से नहीं हो सकेगा। यह काम भावनाशीलों का है, त्यागियों का है। हमको भावनाशील आदमियों की जरूरत है, जिनको हम प्रामाणिक कह सकें, जिनको हम परिश्रमी कह सकें। जो परिश्रमी हैं, वे प्रामाणिक नहीं हैं और वे जो प्रामाणिक हैं, वे परिश्रमी नहीं हैं और वे जो प्रामाणिक और परिश्रमी हैं, उनको मिशन की जानकारी नहीं है। हमारे पास समय बहुत कम है। हमको आदमियों की

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    तुम्हीं को कुम्हार व तुम्हीं को चाक बनना है। हमने तो अनगढ़ सोना ढेरों लाकर रख दिया है, तुम्हीं को साँचा बनाकर सही सिक्के ढालना है। साँचा सही होगा तो सिक्के भी ठीक आकार के बनेंगे। आज दुनिया में पार्टियाँ तो बहुत हैं, पर किसी के पास कार्यकर्ता नहीं हैं‘लेबर’ सबके पास हैं, पर समर्पित कार्यकर्ता जो साँचा बनता है व कई को बना देता है अपने जैसा, कहीं भी नहीं है। हमारी यह दिली ख्वाहिश है कि हम अपने पीछे समर्पित कार्यकर्ता छोडक़र जाएँ। इन सभी को सही अर्थों में ‘डाई’ एक साँचा बनना पड़ेगा तथा वही सबसे मुश्किल काम है। रॉ मेटेरियल तो ढेरों कहीं

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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