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  • आराधना से संबंधित विचार


    लोकमंगल का परमार्थ और उसके सहारे अपनी सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन ही आराधना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    तपस्या का अर्थ है- लोकमंगल का जीवन जीना, समाज, देश, संस्कृति के विकास, प्रगति के लिए श्रम करना, उसमें अपनी अक्ल, धन तथा, समय लगाना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पीड़ितों की सेवा ही भगवान् की सच्ची आराधना हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भावना को पहचानते हैं और उसी के आधार पर भक्त की आराधना का मूल्यांकन करते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उपासना परमात्मा की, साधना अन्तरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की करें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन प्रत्यक्ष देवता है- उसकी आराधना है करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हमारे पास अपना कुछ नहीं है; जो कुछ है ईश्वर का है, हम अपने लिए नहीं, वरन् ईश्वरीय सेवा के लिए है- भावना से कार्य करने पर मनुष्य असंख्य शक्तियाँ प्राप्त करता है


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान की आराधना से ही मनुष्य तुच्छ से महान् बनता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पूत- सपूत वही कहलाता, जो स्वदेश का मान बढ़ाता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान की आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों के दुःख- दर्द को अपना दुःख- दर्द समझो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर की सृष्टि को श्रेष्ठ सुन्दर और समुन्नत बनाना ही उसकी आराधना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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