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    वही सच्चा भक्त है, जो दूसरों के कष्ट में सहभागी बनता है और अपना सुख औरों को बाँटता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धोबी का व्यवसाय है- दूसरों के मैले कपड़ों को बटोरना और उन्हें धुले हुए चमकदार वापस करना। सन्त और सुधारक ऊँची किस्म के धोबी हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जीवन उसी का सार्थक है, जो सदा परोपकार में प्रवृत्त है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    उपासना परमात्मा की, साधना अन्तरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की करें।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    चरित्रवान् व्यक्ति जब विकसित होता है तब उदार हो जाता है, परमार्थ- परायण हो जाता है, लोकसेवी हो जाता है, जनहितकारी हो जाता है और वह अपनी क्षुद्र स्वार्थ, संकीर्णताओं को कम करके लोकहित में, परमार्थ हित में अपने स्वार्थ को देखना शुरू कर देता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर की सृष्टि को श्रेष्ठ सुन्दर और समुन्नत बनाना ही उसकी आराधना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    शिक्षक राष्ट्र मंदिर के कुशल शिल्पी हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पीड़ितों की सेवा ही भगवान् की सच्ची आराधना हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो अपने लिए नहीं औरों के लिए जीते हैं वे जीवनमुक्त हैं ।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दूसरों के दुःख- दर्द को अपना दुःख- दर्द समझो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ज्ञान की आराधना से ही मनुष्य तुच्छ से महान् बनता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    तपस्या का अर्थ है- लोकमंगल का जीवन जीना, समाज, देश, संस्कृति के विकास, प्रगति के लिए श्रम करना, उसमें अपनी अक्ल, धन तथा, समय लगाना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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