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    अपने में सबको और सबमें अपने को देखने का दृष्टिकोण ही तत्त्वज्ञान है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मीठा बोलने वाला शत्रु को भी मित्र बना लेता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भावना की उत्कृष्टता को ही प्यार करता है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् जिसे प्यार करते हैं, उसे परमार्थ प्रयोजनों की पूर्ति के लिए स्फुरणा एवं साहसिकता प्रदान करते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भक्ति अन्तः से उफन कर आने वाली परहित के लिए त्याग- समर्पण की भावना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर प्रेम का मापदण्ड एक ही है -आदर्शों से घनिष्ठ रूप से जुड़ जाना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् जिसे प्यार करते हैं, उसे अग्रि परीक्षाओं में से होकर गुजारते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो अपने समान को ऊँचा उठाने में अपनी योग्यताओं, शक्ति, सुख और सुविधाओं का बलिदान कर सकता है, वही सच्चा ईश्वर- भक्त है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    प्रत्येक से प्यार करो, थोड़े में संतोष रखो और किसी को दुःख मत दो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ईश्वर की भक्ति करने का अर्थ है- आदर्शवाद को प्रेम करना।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भक्ति वह सूत्र है, जो जीवात्मा को परमात्मा के साथ जोड़कर उसे दिव्य बना देती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परिष्कृत आत्मीयता को विशाल क्षेत्र में बिखेर देने का नाम ही प्रेम साधना है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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