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    धर्म अर्थात् कर्तव्य, फर्ज, ड्यूटी, जिम्मेदारी और ईमानदारी का समुच्चय।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म किन्हीं कर्मकाण्डों को नहीं, आत्मोत्कर्ष तथा लोकहित के प्रति अपने कर्तव्यों के पालन को कहते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या से ही भुनाया जा सकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    संसार में सच्चा सुख ईश्वर और धर्म पर विश्वास रखते हुए पूर्ण परिश्रम के साथ अपना कर्तव्य पालन करने में है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    सन्ध्योपासना मनुष्य का परम आवश्यक धर्म कर्तव्य है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपना सुख- वैभव दूसरों को बाँटना और दूसरों के प्रति ममता की वृद्धि ही धार्मिकता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    परोपकार से बढ़कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म शब्द का अर्थ है- धारणा। यहाँ धारणा से तात्पर्य उन आदर्शों की अंतरंग से प्रतिष्ठापना से है, जो व्यक्ति और समाज की श्रेष्ठता और सद्भावना की दिशा में प्रेरित करते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्म में से दुराग्रह और पाखण्ड को निकाल दो। वह अकेला ही संसार को स्वर्ग बनाने में समर्थ है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    हिन्दू धर्म विश्व धर्म बनेगा और वेद मंत्रों से ब्रह्माण्ड गूँजेगा। भारत विश्व का मार्गदर्शक बनेगा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    धर्माचरण करने वाला ही वास्तविक धर्म- प्रचारक होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    ‘‘हिन्दू धर्म विश्व धर्म बनेगा और वेद मंत्रों से ब्रह्माण्ड गूँजेगा। भारत विश्व का मार्गदर्शक बनेगा।’’


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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