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    नारी परिवार का हृदय और प्राण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पुरुष- स्त्री वस्तुतः समान हैं। एक ही रथ के दो पहिए हैं। उसमें से न कोई छोटा है, न बड़ा।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    दाम्पत्य जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, योग है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    नर और नारी एक सम्मान, जाति- वंश सब एक समान।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आभूषणों के अलंकार से कहीं श्रेष्ठ है गुणों का अलंकार।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मानव समाज रूपी गाड़ी में स्त्री- पुरुष दोनों का समान महत्त्व है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    प्यार और सहकार से भरा- पूरा परिवार ही इस धरती का स्वर्ग होता है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मानव समाज रूपी गाड़ी में स्त्री- पुरुष दोनों का समान महत्त्व है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    पत्नी को दासी नहीं, साथी मानिए।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    यदि तारे आकाश की सुषमा- शोभा है, तो नारी इस धरित्री की।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    गुण, कर्म एवं स्वभाव के परिष्कार की प्रयोगशाला है- परिवार।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    लज्जा और विनय ही नारी का आभूषण है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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