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    मनुष्य जीवन कर्मप्रधान है। भाग्य भी कर्म का ही प्रति- फल है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्म तो सभी करते हैं, पर जब वह सदुद्देश्यों के साथ जुड़ जाता है, तो योग बन जाता है।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्म- मार्ग ही सनातन एवं निरापद है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् की सच्ची पूजा सत्कर्मों में ही हो सकती है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् जाति- पाँति को नहीं, कर्म को देखते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्मयोग ही संसार में ऊँचा उठने का श्रेष्ठ साधन है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपैतु सर्व मत् पापम्
    अर्थात्- सब प्रकार के दुष्कर्मों से बचो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो दीपक की तरह प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी में होगा।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो हम सोचते हैं सो करते हैं और जो करते हैं सो भुगतते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है; परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इतराने में नहीं, श्रेष्ठ कार्यों में ऐश्वर्य का उपयोग करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरम्भ करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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