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    ईश्वर को मात्र नाम स्मरण से नहीं, उसके कामों के प्रति लगनशील रहकर ही प्रसन्न किया जा सकता है |


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मात्र हवन, धूपबत्ती और जप की संख्या के नाम पर प्रसन्न होकर आदमी की मनोकामना पूरी कर दिया करें, ऐसे देवी- देवता दुनिया में कहीं नहीं है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    अपने कर्म और कर्मफल को ईश्वर पर छोड़ देने से निराशा, चिन्ता, असंतोष का कोई स्थान नहीं रह जाता।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है; परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    आत्म - निरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन, किन्तु करने योग्य कर्म है।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    जो हम सोचते हैं सो करते हैं और जो करते हैं सो भुगतते हैं।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इतराने में नहीं, श्रेष्ठ कार्यों में ऐश्वर्य का उपयोग करो।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् भी हमें कर्मफल भोग से छुटकारा नहीं दिला सकते।



    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    इस संसार का सबसे बडा़ पुण्य कार्य है - सद्विचारों की प्रेरणा करना और सत्कर्मों के लिए प्रोत्साहन देना ।

    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्म- मार्ग ही सनातन एवं निरापद है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    भगवान् के काम में लग जाने वाला कभी घाटे में नहीं रहता


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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    कर्मयोग ही संसार में ऊँचा उठने का श्रेष्ठ साधन है।


    By Pandit Shriram Sharma Acharya
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