Chintan Quotes

सफल सार्थक जीवन


असफलताओं का दोष भाग्य, भगवान्, ग्रह दशा अथवा संबंधित लोगों को देकर मात्र मन को बहलाने की आत्म- प्रवंचना की जा सकती है, उसमें तथ्य तनिक भी नहीं है। संसार के प्रायः सभी सफल मनुष्य अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़े हैं। उन्होंने कठोर...View More
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प्रगति की आकांक्षा


उन्नति के लिए उत्साहपूर्वक प्रयास करना एक बात है और अपने आपको दीन- दरिद्र अनुभव करना दूसरी। खिलाड़ी खेल में जीत के लिए, पहलवान कुश्ती पछाड़ने के लिए, छात्र ऊँचा वजीफा पाने के लिए प्रतियोगिता में उतरते हैं, प्रयत्न करते और...View More
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सफल सार्थक जीवन


यह भ्रम जितनी जल्दी हटाया जा सके उतना ही अच्छा है कि कोई देव, दानव, मंत्र- तंत्र, गुरु, सिद्ध पुरुष, मित्र, स्वजन, धनी, विद्वान् हमारी कठिनाइयाँ हल कर देंगे या हमें संपन्न बना देंगे। इस परावलम्बन से अपनी आत्मा कमजोर होती है और अंतःकरण में...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


यह भ्रम जितनी जल्दी हटाया जा सके उतना ही अच्छा है कि कोई देव, दानव, मंत्र- तंत्र, गुरु, सिद्ध पुरुष, मित्र, स्वजन, धनी, विद्वान् हमारी कठिनाइयाँ हल कर देंगे या हमें संपन्न बना देंगे। इस परावलम्बन से अपनी आत्मा कमजोर होती है और अंतःकरण में...View More
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सफल सार्थक जीवन


किसी भी कार्य की सफलता विश्वास पर टिकी रहती है। करो या मरो की भावना से ओतप्रोत होकर हम किसी कार्य को प्रारंभ करेंगे तो विजयश्री दौड़ी चली आएगी।
विश्वास के अभाव में ही दुनिया की बहुत सी श्रेष्ठतम...View More
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मानवीय गरिमा


मनुष्य के पास बोलने की शक्ति है। यदि वह समय, परिस्थिति एवं श्रेष्ठता का ध्यान रखते हुए बोलता है तो वह वाणी के सहारे दुनिया में बहुत कुछ कर सकता है, किन्तु वाणी की शक्ति को ध्यान में रखे बिना अनर्गल, व्यर्थ...View More
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सफल सार्थक जीवन


सफलता के बारे में हमारा विश्वास अधूरा नहीं होना चाहिए। उसमें कहीं दरार या छिद्र नहीं होने चाहिए। सफलता के बारे में तिल मात्र भी संदेह हो तो समझना चाहिए कि प्रयत्न में शिथिलता है। शिथिलता होने से सफलता दूर चली जाएगी।...View More
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प्रगति की आकांक्षा


हम अकेले चलें। सूर्य- चंद्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हो। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे- सुने अनुसार नहीं, वरन् स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति...View More
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युग निर्माण योजना


युग परिवर्तन का अर्थ है- व्यक्ति परिवर्तन और यह महान् प्रक्रिया अपने से आरंभ होकर दूसरों पर प्रतिध्वनित होती है। यह तथ्य हमें हजार बार मान लेना चाहिए और उसे कूट- कूट कर नस- नस में भर लेना चाहिए कि दुनिया को...View More
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प्रगति की आकांक्षा


अनीतिपूर्वक बेईमानी अपनाकर यदि कोई धनी बनता है या उन्नतिशील कहलाता है तो वह सारी प्रगति धिक्कारे जाने योग्य है। कर्तव्य और औचित्य का पालन करते हुए भले ही कष्टसाध्य जीवन जीना पड़े, पर उस पथ से विचलित न होना ही...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


आज आस्तिकता भी विकृत हो गयी है। लोग मान बैठे हैं कि थोड़ी सी चापलूसी करने या भेंट पूजा की छोटी- मोटी रिश्वत देकर ईश्वर को अपना पक्षपाती बनाया जा सकता है और फिर उससे अयोग्य होते हुए भी बड़ी- बड़ी...View More
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मानवीय गरिमा


हमें किसी के साथ अनीति नहीं बरतनी चाहिए, पर अन्याय को भी सहन नहीं करना चाहिए। संघर्ष के बिना कोई छुटकारा नहीं। प्रतिरोध में हानि उठानी पड़ सकती है, पर प्रतिरोध न करने में- चुपचाप अनीति सहते रहने में और भी अधिक घाटे...View More
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मानवीय गरिमा


धोखा किसी को भी नहीं देना चाहिए, पर धोखा खाना कहाँ की बुद्धिमानी है। हमें हर किसी पर पूरा विश्वास करना चाहिए, साथ ही पैनी निगाह से यह देखते रहना चाहिए कि कहीं असावधानी से वह अवसर तो उत्पन्न नहीं हो...View More
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प्रेरक विचार


प्रकृति चाहती हे कि हर व्यक्ति सजग और सतर्क रहे, सावधानी बरते और घात- प्रतिघात से कैसे बचा जाता है इस कला की जानकारी प्राप्त करे। सज्जन होना उचित है, पर मूर्ख होना अक्षम्य है। हम दूसरों की सेवा- सहायता विवेकपूर्वक करें, यह ठीक...View More
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प्रेरक विचार


बुराई पहले आदमी से अज्ञानी व्यक्ति के समान मिलती है और हाथ बाँधकर नौकर की तरह उसके सामने खड़ी हो जाती है, फिर मित्र बन जाती है और निकट आ जाती है। इसके बाद मालिक बनती है और आदमी के सिर...View More
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सफल सार्थक जीवन


मानव जीवन की सार्थकता के लिए विचार पवित्रता अनिवार्य है। केवल ज्ञान, भक्ति और पूजा से मनुष्य का विकास एवं उत्थान नहीं हो सकता। जिसके विचार गंदे होते हैं, उससे सभी घृणा करते हैं। शरीर गंदा रहे तो स्वस्थ रहना जिस प्रकार कठिन...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


आत्मा की दृष्टि से संसार के संपूर्ण प्राणी एक समान हैं। शरीर, धन, मान, पद और प्रतिष्ठा की बहुरूपता आत्मगत नहीं होती है। इस दृष्टि से ऊँच, नीच, वर्णभेद, छोटे- बड़े अशक्त, बलवान्, धनी या निर्धन का कोई भेदभाव नहीं उठता। परमात्मा के दरबार में...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


संसार में लगभग ऐसे मनुष्य हैं जो स्वयं तो उन्नति कर नहीं सकते और दूसरों के भी उन्नति पथ में रोड़े अटकाते हैं। ऐसे पुरुषों की परवाह न करके हमें तो केवल बढ़ना ही चाहिए, क्योंकि उन्नति को कष्ट साध्य समझने...View More
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प्रेरक विचार


अपनी बात को ही प्रधान मानने और ठीक मानने का अर्थ और सबकी बातें झूठी मानना है। इस प्रकार का अहंकार अज्ञान का द्योतक है। इस असहिष्णुता से घृणा और विरोध बढ़ता है, सत्य की प्राप्ति नहीं होती। सत्य की प्राप्ति होनी...View More
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प्रगति की आकांक्षा


जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि तुम उसे अपने आचरण में नहीं लाते तो यह तुम्हारी कायरता है। हो सकता है कि भय तुम्हें ऐसा नहीं करने देता हो, लेकिन इससे तुम्हारा न तो चरित्र ऊँचा उठेगा और न तुम्हें गौरव मिलेगा।...View More
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कर्मफल और ईश्वर


ईश्वर को प्रसन्न करने का उपाय केवल यही है कि अपने से निःस्वार्थ भाव से जो भी सेवा, त्याग, परोपकार हो सके, वह किया जाय। संसार क्या करता है? संसार क्या कहेगा? यह सब व्यर्थ की बातें हैं। आत्मा क्या कहेगी? ईश्वर क्या कहेगा? यही...View More
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मानवीय गरिमा


मनुष्यता के गुणों से हीन प्राणी चाहे रावण से धनवान्, शुक्राचार्य से विद्वान्, हिरण्यकश्यपु से पराक्रमी, कंस से योद्धा, मारीच से मायावी, कालनेमि से कूटनीतिज्ञ, भस्मासुर से शक्तिशाली क्यों न हो जावें, पर वे न अपने लिए, न दूसरों के लिए- किसी के लिए...View More
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धर्म और विज्ञान


उत्साह जीवन का धर्म है। अनुत्साह मृत्यु का प्रतीक है। उत्साहवान् मनुष्य ही सजीव कहलाने योग्य है। उत्साहवान् मनुष्य आशावादी होता है। उसे सारा विश्व आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है। विजय, सफलता और कल्याण सदैव आँख में नाचा करते हैं, जबकि उत्साहहीन...View More
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प्रेरक विचार


जब भाइयों- भाइयों, मित्रों- मित्रों में भी सभी बातें समान नहीं होती तो साधारण मनुष्यों में तो सदा विचारों का मेल खाते जाना असंभव ही है। यदि विवाद में सफल होना चाहते हो तो विवाद निष्कर्ष के लिए करो, केवल बकवास के लिए...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


जब कभी आपको क्रोध आवे तो मन ही मन कहिए- दूसरों से गलती हो ही जाती है, मुझे दूसरों की गलतियों पर कुद्ध नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे गलती करते हैं तो उसका यह मतलब नहीं कि मैं और भी बड़ी...View More
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धर्म और विज्ञान


चाहे किसी भी धर्म को न मानना, परन्तु मनुष्य बनकर रहना बहुत अच्छा है। मूढ़ धर्म को मानना अच्छा नहीं है। मूढ़ धर्म का अर्थ है- धर्म का सत्य, सुंदर और शिव रूप नष्ट करके अथवा धर्म में से मनुष्यता निकालकर उसे मिथ्याचार,...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


सच्ची कमाई है उत्तम से उत्तम सद्गुणों का संग्रह। संसार का प्रत्येक प्राणी किसी न किसी सद्गुण से संपन्न है, परन्तु आत्म गौरव का गुण मनुष्यों के लिए प्रभु की सबसे बड़ी देन है। इस गुण से विभूषित प्रत्येक प्राणी को संसार...View More
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सफल सार्थक जीवन


हमारा जीवन भी हर घड़ी थोड़ा- थोड़ा करके मर रहा है। इस दीपक का तेल शनैः- शनैः चूकता चला जा रहा है। भविष्य की ओर हम चल रहे हैं और वर्तमान को भूत की गोदी में पटकते जाते हैं। यह सब देखते हुए...View More
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कर्मफल और ईश्वर


बातें बनाना बड़ा सरल है, दूसरों को उपदेश देने में बहुतेरे कुशल होते हैं, किन्तु वास्तविक तथ्य तो यह है कि जो बात अंतरात्मा को लगे उसे कार्य रूप में परिणत कर प्रत्यक्ष किया जाय। कर्म ही संसार में मुख्य तत्त्व है।...View More
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प्रगति की आकांक्षा


अनीति से धन कमाना बुरा है, संपूर्ण शक्तियों को धन उपार्जन में ही लगाये रहना बुरा है, धन का अतिशय मोह, अहंकार, लालच बुरा है, धन के नशे में उचित- अनुचित का विचार छोड़ देना बुरा है, परन्तु यह किसी भी प्रकार बुरा नहीं...View More
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