Chintan Quotes


आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर अड़े रहने, किसी भी प्रलोभन और कष्ट के दबाव में कुमार्ग पर पग न बढ़ाने, अपने आत्म- गौरव के अनुरूप सोचने और करने, दूरवर्ती भविष्य के निर्माण के लिए आज की असुविधाओं को धैर्य और प्रसन्न चित्त से...View More
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सत्कर्मों की पुण्य प्रवृत्ति कभी- कभी ही पैदा होती है। ऐसा उत्साह भगवान् की प्रेरणा और पूर्व संचित शुभ कर्मों का उदय होने पर ही जाग्रत् होता है, अन्यथा मनुष्य स्वार्थ और पाप की बातें सोचने में ही दिन गुजारता रहता है।...View More
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जिस प्रकार कमाना, खाना, सोना, नहाना जीवन के आवश्यक नित्य कर्म होते हैं, उसी प्रकार परमार्थ भी मानव जीवन का एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्तव्य है। इसकी उपेक्षा करते रहने से आध्यात्मिक पूँजी घटती है, आत्मबल नष्ट होता है और अन्तःभूमिका दिन- दिन...View More
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भोगेच्छा को प्रेम कहना एक बहुत बड़ी प्रवंचना है। प्रेम तो आत्मा में ही हो सकता है और भोग शरीर का किया जाता है। इसलिए जिनके प्रेम के पीछे भोग की लालसा छिपी है, उनकी दृष्टि शरीर तक ही है। आत्मा का भोग...View More
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संसार में बुराइयाँ इसलिए बढ़ रही हैं कि बुरे आदमी अपने बुरे आचरणों द्वारा दूसरों को ठोस शिक्षण देते हैं। उन्हें देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि इस कार्य पर इनकी गहरी निष्ठा है, जबकि सद्विचारों के प्रचारक वैसे...View More
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हर मनुष्य में एक जन्मजात महापुरुष छिपा होता है, लेकिन वह आसुरी तत्त्वों के कारागार में बंद होता है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह उसे देवतत्त्वों की सहायता से मुक्त कर उठाये और महान् कृत्यों द्वारा महानता की ओर...View More
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पक्षपात की मात्रा जितनी बढ़ेगी, उतनी ही विग्रह की संभावना बढ़ेगी। उचित- अनुचित का भेद कर सकना, तथ्य को ढूँढना और न्याय की माँग को सुन सकना पक्षपात के आवेश में संभव ही नहीं हो पाता। अपने पक्ष की अच्छाइयाँ ही दीखती...View More
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‘लक्ष्मी उद्योगी पुरुष- सिंहों को प्राप्त होती है’- यह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग- युग के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एकमात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ ही है। जब तक मनुष्य पुरुषार्थ...View More
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संसार परमात्मा की लीला भूमि और मनुष्य की कर्मभूमि है। यहाँ पग- पग पर प्रतियोगिता में- परीक्षा में अपने को डालकर पात्रता प्रमाणित करनी होती है। उसमें विजय प्राप्त करने पर ही पुरस्कार मिलता है। परीक्षा तथा प्रतियोगिता उत्तीर्ण किए बिना...View More
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सामाजिक सुख- शान्ति और मानवता के मंगल के लिए आवश्यक है कि संसार से मांस भोजन की प्रथा को उठा दिया जाये। इसकी विकृति के कारण मनुष्य क्रोधी बनकर असामाजिक बन जाता है। समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिए जिन...View More
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परिश्रम और केवल उचित परिश्रम ही सफलता का आधार है। इसके लिए परमात्मा की अनायास कृपा पर निर्भर करना अनधिकार चेष्टा है, जो किसी प्रकार पूरी नहीं हो सकती। परमात्मा कृपा करता अवश्य है, किन्तु उन्हीं पर जो पहले स्वयं अपने पर...View More
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खेद का विषय है कि आज लोग संयम की महत्ता को भूलते जा रहे हैं। अधिकांश लोगों की धारणा बन गई है कि संयम अथवा ब्रह्मचर्य जैसे आदर्शों की शिक्षा मात्र कहने- सुनने की बातें हैं। कहना न होगा कि यह एक...View More
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अपने ऊपर आपत्ति व संकट को आया देखकर धैर्य खोना कायरता है। जब संसार के कोई दूसरे लोग दुःख में धैर्य रख सकते हैं, हँसते- खेलते हुए आपत्तियों को पार कर सकते हैं, तो हम ही क्यों उन्हें देखकर रोने- चिल्लाने लगें, जबकि...View More
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मनुष्य यदि सामान्य रूप से सुखी रहना चाहता है तो उसे अपनी परिस्थिति से परे की महत्त्वाकाँक्षाओं का त्याग करना होगा। उसे अपनी सीमा में रहकर आगे के लिए प्रयास करना होगा। उन्हें प्रकृति के इस नियम में आस्था रखनी ही...View More
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क्रोध को क्रोध से जीतने का प्रयास करना बड़ा भारी बिगाड़ पैदा करना है। छोटे- छोटे उलाहने, शब्दों की मार, नुक्ताचीनी, ताने मारना, व्यंग्य करना, प्रतिशोध या घृणावश बुरे नहीं जान पड़ते, पर मन, मस्तिष्क और आत्मा पर इनका विषवत् दुष्प्रभाव पड़ता है। ये...View More
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मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा तथा कार्यों में अभिमान प्राप्त करने की इच्छा खाज की भाँति बड़ा सुहावना रोग है। इसके वश में हो जाने पर मनुष्य सत्कर्मों तक को अभिमान की अग्नि से भस्म कर देता है, प्रमादी बन जाता है। अपने भाग्य पर...View More
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भलाई, शराफत, मृदुता का एक बार किया हुआ सद्व्यवहार वह धन है जो रात- दिन बढ़ता है। यदि दैनिक व्यवहार में आप यह नियम बना लें कि हम जिन लोगों के संपर्क में आयेंगे, उनमें से छोटे- बड़े सबके साथ सद्भावनायुक्त व्यवहार करेंगे,...View More
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आत्मोन्नति का अर्थ है- पशुत्व से मनुष्यत्व की ओर आना। पशुत्व क्या है- मनोविकारों के ऊपर तनिक भी शासन न कर पाना, जब जैसा मनोविकार आया, उसे ज्यों का त्यों प्रकट कर दिया, काम क्षुधा, भूख, प्यास आदि वासनाएँ जैसे ही उत्पन्न हुईं...View More
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आज हमारे समाज में काम का फल जल्दी से जल्दी पाने की प्रवृत्ति हो गई है। लोग खेत को बिना जोते ही- बिना बोए या सींचे ही शान्ति और सफलता रूपी फसल काटने को तैयार बैठे हैं। जब कारण ही नहीं तो...View More
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समस्त शुभ- अशुभ, सुख- दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान- पतन के मुख्य कारक विचारों को वश में रखना मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिए, उनको मंगल मूलक बनाइए, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिए और वे आपको स्वर्ग की...View More
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सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके छल, कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा।
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हमें यह भ्रम निकाल ही देना चाहिए कि बेईमानी कुछ कमा सकती है। वह शराब की तरह उत्तेजना मात्र है, जिससे ठगने वाला और ठगा जाने वाला बुद्धिभ्रम में ग्रस्त हो जाते हैं। नशा उतरने पर नशेबाज की जो खस्ता हालत...View More
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दुष्ट विचार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। पाप का विचार, चोरी, कपट, ईर्ष्या, निराशा का विचार हमारा सर्वनाश कर सकता है। ईश्वर का एक मानसिक चित्र अंतःकरण में तैयार कर लें और सत्य, प्रेम, न्याय से अपना हृदय नित्य विकसित करते रहें। स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता और...View More
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हर मनुष्य के जीवन में अवसर आता है, किन्तु एक बार निराश होने पर दुबारा नहीं आता है। किसी भी अवसर से यह आशा करना मृग मरीचिका के तुल्य है कि वह आपका द्वार दुबारा खटखटायेगा। बुद्धिमान् लोग अवसर को आगे...View More
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यह नहीं देखना चाहिए कि बुराई से वैभव बढ़ता है। यदि ऐसा हुआ भी तो वह क्षणिक ही होगा। बुराई जितनी जल्दी बढ़ती है, उतनी ही जल्दी नष्ट हो जाती है, साथ ही कर्ता को भी नष्ट कर डालती है। आकाश तक...View More
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अच्छाई के विकास में चिन्ता, दुःख और भय भी हमारे सामने आयें तो भी उनके सुखप्रद परिणाम की आशा से हमें उस प्रक्रिया को बंद नहीं कर देना चाहिए। सरल, शुद्ध और सहन करने योग्य दुःखों ने सदैव आत्मा को बलवान् ही...View More
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भाग्य और भविष्य परमात्मा की जबर्दस्त शक्तियाँ हैं। मनुष्य की शक्ति इनके आगे छोटी है, पर वह अपने विवेक से यह निर्णय अवश्य ले सकता है कि उसका जन्म किसलिए हुआ है और वह ईश्वरीय विधान में किस हद तक सहायक...View More
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भिक्षा अनैतिक है। भिक्षा व्यवसायी की मनोभूमि दिन- दिन पतित होती जाती है। उसका शौर्य, साहस, पौरुष, गौरव सब कुछ नष्ट हो जाता है और दीनता मस्तिष्क पर बुरी तरह छाई रहती है। अपराधी की तरह उसका सिर नीचा रहता है। अपनी स्थिति का...View More
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विचार एक शक्ति है, विशुद्ध विद्युत् शक्ति। जो इस पर समुचित नियंत्रण कर ठीक दिशा में संचालन कर सकता है वह बिजली की भाँति इससे बड़े- बड़े काम ले सकता है, किन्तु जो इसको ठीक से अनुशासित नहीं कर सकता, वह उलटा...View More
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प्रगति की आकांक्षा


सफलता का पथ निश्चय ही बड़ा कठिन और दुर्गम होता है। उसको सरल और प्रशस्त बनाने में मनुष्य की इच्छा शक्ति का बड़ा उपयोग है। इच्छा शक्ति की दृढ़ता और प्रबलता मनुष्य को पराक्रमी, पुरुषार्थी और धीर- गंभीर बना देती...View More
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