Chintan Quotes


शिष्टाचार हमारे आचरण और व्यवहार का एक नैतिक मापदण्ड है, जिस पर सभ्यता और संस्कृति का भवन निर्माण होता है। एक दूसरे के प्रति सद्भावना, सहानुभूति, सहयोग आदि शिष्टाचार के मूलाधार हैं। इन मूल भावनाओं से प्रेरित होकर दूसरों के प्रति नम्र, विनयशील, संयम,...View More
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जीवन एक संग्राम है। इसमें वही व्यक्ति विजय प्राप्त कर सकता है, जो या तो परिस्थिति के अनुकूल अपने को ढाल लेता है या जो अपने पुरुषार्थ के बल पर परिस्थिति को बदल देता है। हम इन दोनों में से किसी भी...View More
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बुराइयों के प्रति लोगों में जिस तरह आकर्षण होता है, उसी तरह यदि ऐसा दृढ़ भाव हो जाय कि हमें अमुक शुभ कर्म अपने जीवन में पूरा करना ही है तो उस कार्य की सफलता असंदिग्ध हो जायगी। यदि सिनेमा...View More
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किसी विचारधारा का परिणाम तभी प्राप्त हो सकता है, जब वह कार्यरूप में परिणत हो। मानसिक व्यसन के रूप में कुछ पढ़ते- सुनते और सोचते रहें, कार्यरूप में उसे परिणत न करें तो उस विचार विलास मात्र से कितना उद्देश्य पूर्ण हो...View More
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गुणों का चिंतन न करें, केवल अवगुणों पर ही दृष्टिपात करें तो अपना प्रत्येक प्रियजन भी अनेकों बुराइयों, दोषों में ही ग्रस्त दिखाई देगा। अतः स्नेह, आत्मीयता, सौजन्यता तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार में कमी आयेगी, जिससे जीवन के सुखों का अभाव हो जायेगा। अपने बच्चों...View More
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अपनी बातों को ठीक मानने का अर्थ तो यही होता है कि दूसरे सब झूठे हैं- गलत हैं। इस प्रकार का अहंकार अज्ञान का द्योतक है। इस असहिष्णुता से घृणा और विरोध बढ़ता है। सत्य की प्राप्ति नहीं होती। सत्य की प्राप्ति तभी...View More
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विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने आती है। इससे हृदय में जो पीड़ा, आकुलता और छटपटाहट होती है उससे चाहें तो अपना सद्ज्ञान जाग्रत् कर सकते हैं। भगवान् को प्राप्त करने के लिए जिस साहस और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, दुःख उसकी...View More
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कर्म चाहे वह आज के हों अथवा पूर्व जीवन के। उनका फल असंदिग्ध है। परिणाम से मनुष्य बच नहीं सकता। दुष्कर्मों का भोग जिस तरह भोगना ही पड़ता है, शुभ कर्मों से उसी तरह श्री- सौभाग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह...View More
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भाग्यवाद का नाम लेकर अपने जीवन में निराशा, निरुत्साह के लिए स्थान मत दीजिए। आपका गौरव निरन्तर आगे बढ़ते रहने में है। भगवान् का वरद् हस्त सदैव आपके मस्तक पर है। वह तो आपका पिता, अभिभावक, संरक्षक, पालक सभी कुछ है। उसकी निष्ठुरता आप...View More
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खोयी हुई दौलत फिर कमाई जा सकती है। भूली हुई विद्या फिर याद की जा सकती है। खोया हुआ स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय किसी प्रकार लौट नहीं सकता। उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह...View More
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यह कहना उचित नहीं कि इस कलियुग में सज्जन घाटे और दुर्जन लाभ में रहते हैं। सनातन नियमों में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। सत्य और तथ्य देश- काल, पात्र का अंतर किये बिना सदा सुस्थिर और अक्षुण्ण ही रहते हैं। सन्मार्ग पर...View More
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अपने सुख- दुःख, उन्नति- अवनति, कल्याण- अकल्याण, स्वर्ग और नरक का कारण मनुष्य स्वयं है। फिर दुःख या आपत्ति के समय भाग्य के नाम पर संतोष कर लेना और भावी सुधार के प्रति अकर्मण्य बन जाना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति आने पर तो...View More
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भले ही मनुष्य अपने पापों को किसी भी तरह अनेक तर्क, युक्तियाँ लगाकर टालता रहे, किन्तु अंत में समय आने पर उसे ही पाप का फल भोगना पड़ता है। पाप जिसने किया है, उसी को भोगना पड़ता है, दूसरे को नहीं। यह मनुष्य...View More
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मनुष्य सुखों की, पुण्य फल की इच्छा तो करता है, किन्तु पुण्य अर्जित नहीं करता है। पाप के दुष्परिणामों से डरता है, किन्तु यत्नपूर्वक करता दुष्कर्म ही है- ऐसी स्थिति रहते हुए भला किसी को सुख मिल सकता है? आम का फल आम...View More
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महानता मनुष्य के अंदर छिपी हुई है और व्यक्त होने का रास्ता ढूँढ़ती है, पर सांसारिक कामनाओं में ग्रस्त मनुष्य उस आत्म प्रेरणा को भुला देना चाहता है, ठुकराये रखना चाहता है। अपमानित आत्मा चुपचाप शरीर के भीतर सुप्त पड़ी रहती...View More
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दुनिया में हर आदमी के सामने समस्याएँ हैं। सबकी अपनी- अपनी उलझनें हैं, पूर्ण संतुष्ट और सुखी व्यक्ति की रचना परमात्मा ने नहीं की है। जितना कुछ प्राप्त है, उस पर आनंद मनाने- संतुष्ट रहने की और अधिक प्राप्त करने के लिए प्रयत्न...View More
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बच्चों को आमतौर से उनके अभिभावक बहुत अच्छे उपदेश देते रहते हैं और उन्हें राम, भरत एवं श्रवण कुमार देखना चाहते हैं, पर कभी यह नहीं सोचते कि क्या हमने अपनी वाणी एवं आकाँक्षा को अपने में आवश्यक सुधार करके इस...View More
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विषय वासनाएँ हाथ में पकड़ी हुई छड़ी की तरह तो है नहीं कि हाथ खोल दीजिए वह स्वतः गिर जायेगी। यह जन्म- जन्मांतर का कलुष है, जो मनोदर्पण पर संचित होकर स्थायी बन जाता है। इसे मल- मल कर धोना पड़ेगा। जिस...View More
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हम जीवन में जितना निरर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं यदि उतने समय में कुछ काम किया जाय तो उतने से एक नया हिमालय पहाड़ बन जाये। यदि इन शब्दों का उपयोग किसी को सान्त्वना देने, भगवद् पूजन, प्रभु नाम...View More
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मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे- सुने चल रहे हैं। संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान् कार्य करना चाहे तो उसे एक...View More
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उन्नति कोई उपहार नहीं है, जो छत फाड़कर अनायास ही हमारे घर में बरस पड़े। उसके लिए मनुष्य को कठोर प्रयत्न करने पड़ते हैं और एक मार्ग अवरुद्ध हो जाय तो दूसरा सोचना पड़ता है। गुण, योग्यता और क्षमता ही सफलता का...View More
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इस संसार की रचना कल्पवृक्ष के समान नहीं है कि जो कुछ हम चाहें वह तुरन्त ही मिल जाया करें। यह कर्मभूमि है, जहाँ हर किसी को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। अपनी योग्यता और विशेषता का प्रमाण प्रस्तुत किये...View More
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लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर लम्बी चौड़ी डींग हाँक कर या बड़े बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो...View More
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स्वतंत्र बुद्धि की कसौटी पर आप जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं उसे साहस के साथ प्रकट कीजिए, दूसरों को सिखाइए। चाहे आपको कितने ही विरोध- अवरोधों का सामना करना पड़े, आपकी बुद्धि जो निर्णय देती है, उसका गला न घोटें। आप देखेंगे...View More
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उतावले और जल्दबाज, असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति एक प्रकार के अधपगले कहे जा सकते हैं। वे जो कुछ चाहते हैं उसे तुरन्त ही प्राप्त हो जाने की कल्पना किया करते हैं। यदि जरा भी देर लगती है तो अपना मानसिक संतुलन...View More
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जो अपनी समीक्षा करने और अपना सुधार कर सकने की आवश्यकता को समझता है और उसके लिए ईमानदारी से तत्पर रहता है, वह गिरी हुई स्थिति में नहीं पड़ा रह सकता। उसके जीवन का विकास होने ही वाला है। उसे प्रगति के...View More
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पुरुषार्थ ही हमारी स्वतंत्रता और सभ्यता की रक्षा करने के लिए दृढ़ दुर्ग है। जिसे कोई भी बेध नहीं सकता। हमें अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर, पुरुषार्थ के बल जीवन संघर्ष में आगे बढ़ना होगा। यदि हमें कुछ करना है, स्वतंत्र रहना है,...View More
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भूलें वे हैं, जो अपराधों की श्रेणी में नहीं आतीं, पर व्यक्ति के विकास में बाधक हैं। चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, आलस्य, प्रमाद, कटुभाषण, अशिष्टता, निन्दा, चुगली, कुसंग, चिन्ता, परेशानी, व्यसन, वासनात्मक कुविचारों एवं दुर्भावनाओं में जो समय नष्ट होता है, उसे स्पष्टतः समय की बर्बादी कहा जायेगा। प्रगति के...View More
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घिसने और टकराने से शक्ति उत्पन्न होती है। यह वैज्ञानिक नियम है। ईश्वर अपने प्रिय पुत्र मानव को शक्तिवान, प्रगतिशील, विकासोन्मुख, चतुर, साहसी और पराक्रमी बनाना चाहता है। इसीलिए उसने समस्याओं और कठिनाइयों का एक बड़ा अम्बार प्रत्येक मनुष्य के सामने खड़ा किया...View More
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अपनी आलोचना कर सकना, आत्म निरीक्षण करके अपनी बुराइयाँ ढूँढ सकना और उन्हें सुधारने के लिए तत्पर हो सकना सचमुच ही एक बड़ी बहादुरी और दूरदर्शिता का काम है। जिसमें इतना साहस आ गया, उसे सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक व्यक्ति...View More
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