Chintan Quotes

धर्म और विज्ञान


स्वयं उन्नति करना, सदाचारी होना काफी नहीं, दूसरों को भी ऐसी ही सुविधा मिले इसके लिए प्रयत्नशील रहना भी आवश्यक है। जो इस ओर से उदासीन है, वे वस्तुतः अपराधी न दीखते हुए भी अपराधी है।
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Pandit Shriram Sharma Acharya
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


स्वयं उन्नति करना, सदाचारी होना काफी नहीं, दूसरों को भी ऐसी ही सुविधा मिले इसके लिए प्रयत्नशील रहना भी आवश्यक है। जो इस ओर से उदासीन है, वे वस्तुतः अपराधी न दीखते हुए भी अपराधी है।
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ईश्वर और धर्म की मान्यताएँ केवल इसलिए हैं कि इन आस्थाओं को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति निजी जीवन में सदाचारी और सामाजिक जीवन में परमार्थी बने। यदि यह दोनों प्रयोजन सिद्ध न होते हों, तो यही कहना पड़ेगा कि तथाकथित ईश्वर...View More
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मानवीय गरिमा


ईश्वर विश्वास का अर्थ है- एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना, जो सर्वव्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


ईश्वर विश्वास का अर्थ है- एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना, जो सर्वव्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक...View More
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प्रगति की आकांक्षा


प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


भाग्यवाद एवं ईश्वर की इच्छा से सब कुछ होता है- जैसी मान्यताएँ विपत्ति में असंतुलित न होने एवं संपत्ति में अहंकारी न होने के लिए एक मानसिक उपचार मात्र है। हर समय इन मान्यताओं का उपयोग अध्यात्म की आड़ में करने...View More
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कर्मफल और ईश्वर


भाग्यवाद एवं ईश्वर की इच्छा से सब कुछ होता है- जैसी मान्यताएँ विपत्ति में असंतुलित न होने एवं संपत्ति में अहंकारी न होने के लिए एक मानसिक उपचार मात्र है। हर समय इन मान्यताओं का उपयोग अध्यात्म की आड़ में करने...View More
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धर्म और विज्ञान


बातों का जमाना बहुत पीछे रह गया है। अब कार्य से किसी व्यक्ति के झूठे या सच्चे होने की परख की जायेगी। कुछ लोग आगे बढ़कर यह सिद्ध करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


बातों का जमाना बहुत पीछे रह गया है। अब कार्य से किसी व्यक्ति के झूठे या सच्चे होने की परख की जायेगी। कुछ लोग आगे बढ़कर यह सिद्ध करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका...View More
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धर्म और विज्ञान


अवांछनीय चिंतन और चरित्र अपनाये रहने पर किसी भी पूजा- पाठ के सहारे किसी को दैवी अनुकम्पा का एक कण भी हस्तगत नहीं होता। जब पात्रता को परखे बिना भिखारियों तक को लोग दुत्कार देते हैं, तो बिना अपनी स्वयं की उत्कृष्टता...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


अवांछनीय चिंतन और चरित्र अपनाये रहने पर किसी भी पूजा- पाठ के सहारे किसी को दैवी अनुकम्पा का एक कण भी हस्तगत नहीं होता। जब पात्रता को परखे बिना भिखारियों तक को लोग दुत्कार देते हैं, तो बिना अपनी स्वयं की उत्कृष्टता...View More
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मानवीय गरिमा


गुण्डागर्दी और बदमाशी इसलिए सफल होती रही है उसके प्रतिरोध में कोई तन कर नहीं खड़ा होता। अन्यथा संसार में दुष्टता की तुलना में सज्जनता का अनुपात कहीं अधिक है, पर सज्जनों की कायरता अपने ऊपर मुसीबत आने पर ही कुछ...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


गुण्डागर्दी और बदमाशी इसलिए सफल होती रही है उसके प्रतिरोध में कोई तन कर नहीं खड़ा होता। अन्यथा संसार में दुष्टता की तुलना में सज्जनता का अनुपात कहीं अधिक है, पर सज्जनों की कायरता अपने ऊपर मुसीबत आने पर ही कुछ...View More
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धर्म और विज्ञान


धर्म का रूप आज पूजा- पाठ, तिलक, छापा, जटा, कमण्डल, स्नान, मंदिर दर्शन या थोड़ा सा दान- पुण्य कर देना मात्र मान लिया गया है। इतना कुछ कर लेने वाले अपने को धर्मात्मा समझने लगते हैं। हमें समझना और समझाना होगा कि यह धर्म का...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


धर्म का रूप आज पूजा- पाठ, तिलक, छापा, जटा, कमण्डल, स्नान, मंदिर दर्शन या थोड़ा सा दान- पुण्य कर देना मात्र मान लिया गया है। इतना कुछ कर लेने वाले अपने को धर्मात्मा समझने लगते हैं। हमें समझना और समझाना होगा कि यह धर्म का...View More
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मानवीय गरिमा


अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बड़े लाभ से वंचित हो जाता है वह है- दूसरों की सहानुभूति खो बैठना। स्वार्थी व्यक्ति यों कभी किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


अपने को अपने तक ही सीमित रखने की नीति से मनुष्य एक बहुत बड़े लाभ से वंचित हो जाता है वह है- दूसरों की सहानुभूति खो बैठना। स्वार्थी व्यक्ति यों कभी किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


अक्लमन्दी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धूर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गर्त में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव बंधन है। इस पाश से छुड़ा...View More
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सफल सार्थक जीवन


पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा दिखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। जैसे आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान वस्तुओं के ढेर को जलाकर राख कर देती है। पला हुआ सांप कभी भी डस सकता है। उसी प्रकार...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा दिखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। जैसे आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान वस्तुओं के ढेर को जलाकर राख कर देती है। पला हुआ सांप कभी भी डस सकता है। उसी प्रकार...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं- अपने को सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचे...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं- अपने को सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचे...View More
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मानवीय गरिमा


अपने समाज के सुधार पर ध्यान देना उतना ही आवश्यक है, जितना अपना स्वास्थ्य एवं उपार्जन की समस्याओं का सुलझाना। समाजगत पापों से हम निर्दोष होते हुए भी पापी बनते हैं। भूकम्प, दुर्भिक्ष, युद्ध, महामारी आदि के रूप में ईश्वर भी हमें सामूहिक...View More
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समाज निर्माण


अपने समाज के सुधार पर ध्यान देना उतना ही आवश्यक है, जितना अपना स्वास्थ्य एवं उपार्जन की समस्याओं का सुलझाना। समाजगत पापों से हम निर्दोष होते हुए भी पापी बनते हैं। भूकम्प, दुर्भिक्ष, युद्ध, महामारी आदि के रूप में ईश्वर भी हमें सामूहिक...View More
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सफल सार्थक जीवन


आज हर आदमी यही सोचता है कि अनैतिक रहने में उसका भौतिक लाभ है। इसलिए वह बाहर से नैतिकता का समर्थन करते हुए भी भीतर ही भीतर अनैतिक रहता है। हमें मानसिक स्वच्छता का वह पहलू जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा,...View More
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मानवीय गरिमा


आज हर आदमी यही सोचता है कि अनैतिक रहने में उसका भौतिक लाभ है। इसलिए वह बाहर से नैतिकता का समर्थन करते हुए भी भीतर ही भीतर अनैतिक रहता है। हमें मानसिक स्वच्छता का वह पहलू जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा,...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


आज आदमी खुशी के लिए तरस रहा है। जिन्दगी की लाश इतनी भारी हो गई है कि वजन ढोते- ढोते आदमी की कमर टूट गई है। वह खुशी ढूँढने के लिए सिनेमा, क्लब, रेस्टारेंट, कैबरे डांस सब जगह जाता है, पर वह...View More
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मानवीय गरिमा


इन दिनों अगणित संकटों और झंझटों का सामना करना पड़ रहा है। उनका निमित्त कारण अपना भटकाव ही है, जिसे कोई चाहे तो अनर्थ आचरण भी कह सकता है। गलती करने वाले पर ही यह दायित्व भी लद जाता है कि वही...View More
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